एक्ठो रहें बड़े ओहदे वाले बड़का ब्लॉगर.. सो डिस्केशन डिस्केशन में उनका डिलेवर भी ब्लॉग-श्लॉग लिख लेने लगा रहा । उनकी काम वाली बाई भी कुछ कविताई की बेहयाई कर लेती रही, सो वहू ब्लॉगर को पकड़ लिहिस । उनका नौकर भी कहीं से कुछ टीप टाप कर एक रेजिस्टर में चेंप देता रहा, छापे में कौन छापता.. सो खुदै कम्पूटर नामक एकु मशीन में लिख कर टाँग देता रहा । ई-सब आदत पकड़ लिहै से उनकी अकड़ की तो आप पूछौ मति ! एहर साहब को डीप-रेस्सन का शौक रहा, जब वह गोली खाय के मूड़ झुकाय के बईठें, तो यहि देख के, ई दुईनो तीनों जन उनके ठियाँ पर जाँय अउर टिपिया आवत रहें । गँज़ी चाँद पर टिपियावै में नौकरी जाय का खतरा, पर ईहाँ टिपियाये पर पगार बढ़वाय का जतरा । दफ़तर जाये से पहिले साहब जी नाश्ते में एक छोटा-कप बीति-ताहि बिलागरस ज़रूर लेत रहें । कुल मिला कर ज़ायज़ा यह कि उनकी एक सुसम्पन्न ब्लॉगर परिवार की छवि बनती रही.. अपने बड़का बिलागर वईसे तो शाकाहारी रहें लेकिन मीट के बड़े शौकीन रहें... जौन रस्ते निकर पड़ें ऊहैं लेयो धड़ाक एकु बिलागर मीट... एहिके सबूत का फोटू उनके मोबैईल में हर घड़ी मौज़ूद रहती रही । अब ई जानौ के फोटू कउनौ झूठ थोड़े बोलि ?
ओहर उनका ऊ नौकरवा उनके कुत्ते को रोज घुमाने ले जाता रहा, सो कुत्तौ सँगत पाय के बिलाग-सिलाग की भाखा में कुँकिंयाने लगा.. कुकूर का यहि ऎश-ठाठ देख एकु बिल्ली रोज उसका रस्ता काट देती रही, पर सँभ्राँत बिलागर कुल की रोटी अदा करने के नाते ऊई कुतौना उसको हमेशा अनदेखा कर देता रहा । हलाकान होय के बिल्लिनौ एकु ब्लॉग शुरु कर दिहिस, गरियावै का भला एहिसे सस्ता अच्छा अउर टिकाऊ मँच कहाँ पाये । ई परिवार मोहल्ला ब्लॉगगँज़, मुकाम गूगलसराय में आजौ गुलज़ार है ! ई एहि निट्ठल्ले का पहिला टेस्ट पोस्ट है, मुलाचिट्ठाचर्चा से इसका कउनौ रिलेशन नहिं है । कुल माज़रा ई कि, जौन कमी-बेशी होय उई बतावा जाय !
आज कुछ ज़्यादा लिख कर तुम्हें परेशान नहीं करूँगा । भई, आज  तो  बाल-दिवस  है, बोले  तो  हैप्पी चिल्ड्रेन्स डे !  बोलो है ना, क्योंकि तुम्हारे स्कूलों में आज खूब गाने वाने, डाँस, फ़ैन्सी ड्रेस  वगैरह हुआ होगा ?  तुम सबने  हुल्लड़ मस्ती और चुटकुलों के चटकारे लिये होंगे । आज तो ढेर सारी शुभकामनायें मिल रहीं होंगी । अब अगर मैं अचपन जी, तुम्हें शुभकामना न भेजूँ, यह बड़ी गड़बड़ बात हो जायेगी । लेकिन  मैं  कुछ  कँज़ूस  और  थोड़ा थोड़ा  लालची  भी  हूँ ।  बूझो  कैसे  ? वह  ऎसे  कि  मुझे  अपनी शुभकामनाओं के बदले अपना मनपसँद रिटर्न-गिफ़्ट चाहिये होता है । तो..आज  लग  जाये  एक  शर्त, कि मुझे मेरा रिटर्न-गिफ़्ट तुम सब बड़े होकर ज़रूर दोगे ? जी हाँ, आपको भारत का गौरव बन कर पूरी दुनिया को दिखाना है ! तब तो आपकी वज़ह से आपके मम्मी, पापा और अचपन जी भी फ़ेमस हो जायेंगे  अगली बार मैं बताऊँगा कि, मैं सोन-पापड़ी, पतीसा क्यों नहीं खाता । एनी गेस ? अब तुम दिमाग लगाओ, मैं तो चला.. मेरे बहुत सारे काम पेन्डिंग पड़े हैं । तो.. तुम सबको हैप्पी चिल्ड्रेन्स डे और अचपन जी का जय हिन्द !  कुछ कविताएं ऐसी होती है जब लिखी जाती है तो जाने क्या सोचकर .पर जब सामने आती है तो कई लोगो की बन जाती है ..कभी कभी सोचता हूं ...के पियूष मिश्रा क्या .."तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया "के बाद क्या उससे बेहतर लिख पायेगे ..क्या प्रसून जोशी ....तारे जमीन के बाद उसी इंटेंसिटी को दोहरा पायेगे ....कंसिस्टेंसी कितनी मुश्किल हो जाती है न..... तीन अलग कवि ..तीन अलग कविताएं ....तीन अलग सोच .......  पहली कविता महेन की ……इससे तो बेहतर है अनजान लोगों से बतियाया जाए कुछ भी किताबों में घुसा लिया जाए सिर एक के बाद एक चार-पांच फ़िल्में देख डाली जाएं पूरी रात का सन्नाटा मिटाने के लिये टके में जो साथ हो ले ऐसी औरत के साथ काटी जाए दिल्ली की गुलाबी ठंडी शामें गुलमोहर के ठूँठ के नीचे या दोस्तों को बुला लिया जाए मौके-बेमौके दावत पर तुम्हे प्यार करते रहना खुद से डरने जैसा है और डर को भुलाने के लिये जो भी किया जाए सही है।  दूसरी कविता नन्दनी महाज़न जी की है ......
दोनों हाथ उठा कर एक बार फ़िर से मांगती हूँ हे पहाड़ों पर बसने वाली चील मेरे चाक जिग़र के टुकड़े लौटा दो ! तुम्हारे बच्चे जी भी जायेंगे उसके बिना तुम फ़िर बनोगी हज़ार हज़ार बच्चों की माँ और फ़िर मैं जब भी दुआ पढूंगी तो मेरे लब बोलेंगे सातों आसमानों पर तुम्हारा राज़ हो जाए ग़र ये कल होना है तो मेरे परवरदीगार ये आज हो जाए ।
उस नेक इंसान के लिए ये तो मैंने ही बुनी थी मुश्किलें उससे घर माँगा उससे एक वर माँगा और जो लाल रंग तुम्हारी चोंच में लगा है उसको अपने सर माँगा
उसको बेवफ़ा न कहो उसने किया है एक वादा कल रात कोई रफूगर आएगा मेरे चाक जिगर को रफू कर जाएगा
हे आसमां की शहज़ादी लौटा दो मेरे चाक जिगर के टुकड़े कोई रफूगर आने को है ...
तीसरी कविता गौरव सोलंकी की है ......
शहीद होने की एक ज़रूरी सामाजिक प्रक्रिया में मैं ग़ैरज़रूरी ढंग से फँस गया हूं शर्मिन्दा हूं। बिसलेरी की पुरानी बोतल की तरह, जिसकी विप्लवी आत्मा को तुमने रैपर की तरह छीला है निरंतर बेवज़ह, तुम मुझे बार बार खाली करती हो बूंद बूंद टप टप और किसी सीले हुए पहाड़ी स्टेशन की टोंटी पर से फिर भर लेती हो। या कि तुम्हारे लगातार बेघर होने की प्रक्रिया में मैं घर हूं तुम्हारे सरहद होने की प्रक्रिया में पाकिस्तान ? डर और अचरज मुझे क्रमश: नींद और भूख की तरह होते हैं। क्या मुझे चौंकते चौंकते हो जाना है शहर की तरह कुत्ता और दुम हिलानी है ? हर दुतकारे जाने के बाद करना है पुचकारे जाने का इंतज़ार और वे सब लम्बी रातें भुलाकर – सच जब मैं किसी अनजान ट्रेन में चढ़कर हो जाना चाहता था लापता किसी लम्बी खदान में पत्थर तोड़ने को उम्र भर - कूं कूं करके खाने हैं ब्रेड और बिस्किट और तुम्हारी ट्यूबलाइट सी नंगी टाँगों पर टाँगें रखकर बेताब बिस्तर पर साथ सोना है ? नींद भर अँधेरा है और है राख में रेत जिसमें मैं तुमसे कहता हूं कि घर है। लौटेंगे। मेरा 10 दिन का लीव एप्लिकेशन रिकेमेन्ड एन्ड फ़ारवर्ड कर दीजिये ।" मेज़र उनसे भन्नाये अंदाज़ में पूछते हैं, "क्यों, क्या है ?" हवलदार बगलें झाँकते हुये बोले, "शौह्हः, मेरा ताऊ इलेक्शन में पिल पड़ा है... सो, थोड़ा परचार-उरचार कर आयें, फ़ेमिली की नाक ख़तरे में है, प्लीज़ शौह्हः !" मेज़र किचकिचा पड़े, "अरे ज़वान, पहले यहाँ तुम अपने देश की नाक की सोचो. " बीस हफ़्ते की कैम्पिंग में सत्तरह हफ़्ते तुमने ऎंवेंई बिता दिये । दस दिन के छुट्टी और चार दिन की मूवमेन्ट के बाद तुम्हारे पास बचा ही क्या ? " हवलदार रामबवाली भारती उतावले हो उठे, " शौह्हः मेरी रेगुलर पेट्रोलिंग चल रही है, आज भी नाइट पेट्रोलिंग पर रिपोर्ट करना है ।" मेज़र भभक पड़े, " तो ? तो, अब तक की ड्यूटी में तुमको एक भी इन्ट्रूडर या घुसपैठ की रिपोर्टिंग का चांस ही नहीं मिला ? जाओ, अपनी ड्यूटी पर.. कोई कारनामा दिखाओ, तभी रिकेमेन्डेशन की सोचेंगे.. मूव नाऔ !" दहाड़ सुन कर, बेचारे भारती हवलदार उल्टे पाँव वापस हो लिये, गिनती परेड होनी थी । अगली सुबह रामबवाल हवलदार फिर मेज़र साहब के सामने हाज़िर, " शौह्हः रामबवाल रिपोर्टिंग सर !" पर, मेज़र जैसे कुछ सुनना ही नहीं चाहते थे, "नो नो, आई सेड नो वेऽऽ.. गो बैक टू योर पोस्ट !" अबकी हवलदार एकदम तड़क कर बोले, " शौह्हः हमने कल रात दुश्मन का एक टैंक अपनी सीमा के अंदर घुसते पकड़ लिया । सर, पूरा का पूरा क्रू तो एस्केप कर गया लेकिन टैंक हमारे क़ब्ज़े में आगया है ! आप गैरिसन में देख लीजिये, सर !"
मेरा 10 दिन का लीव एप्लिकेशन रिकेमेन्ड एन्ड फ़ारवर्ड कर दीजिये ।" मेज़र उनसे भन्नाये अंदाज़ में पूछते हैं, "क्यों, क्या है ?" हवलदार बगलें झाँकते हुये बोले, "शौह्हः, मेरा ताऊ इलेक्शन में पिल पड़ा है... सो, थोड़ा परचार-उरचार कर आयें, फ़ेमिली की नाक ख़तरे में है, प्लीज़ शौह्हः !" मेज़र किचकिचा पड़े, "अरे ज़वान, पहले यहाँ तुम अपने देश की नाक की सोचो. " बीस हफ़्ते की कैम्पिंग में सत्तरह हफ़्ते तुमने ऎंवेंई बिता दिये । दस दिन के छुट्टी और चार दिन की मूवमेन्ट के बाद तुम्हारे पास बचा ही क्या ? " हवलदार रामबवाली भारती उतावले हो उठे, " शौह्हः मेरी रेगुलर पेट्रोलिंग चल रही है, आज भी नाइट पेट्रोलिंग पर रिपोर्ट करना है ।" मेज़र भभक पड़े, " तो ? तो, अब तक की ड्यूटी में तुमको एक भी इन्ट्रूडर या घुसपैठ की रिपोर्टिंग का चांस ही नहीं मिला ? जाओ, अपनी ड्यूटी पर.. कोई कारनामा दिखाओ, तभी रिकेमेन्डेशन की सोचेंगे.. मूव नाऔ !" दहाड़ सुन कर, बेचारे भारती हवलदार उल्टे पाँव वापस हो लिये, गिनती परेड होनी थी । अगली सुबह रामबवाल हवलदार फिर मेज़र साहब के सामने हाज़िर, " शौह्हः रामबवाल रिपोर्टिंग सर !" पर, मेज़र जैसे कुछ सुनना ही नहीं चाहते थे, "नो नो, आई सेड नो वेऽऽ.. गो बैक टू योर पोस्ट !" अबकी हवलदार एकदम तड़क कर बोले, " शौह्हः हमने कल रात दुश्मन का एक टैंक अपनी सीमा के अंदर घुसते पकड़ लिया । सर, पूरा का पूरा क्रू तो एस्केप कर गया लेकिन टैंक हमारे क़ब्ज़े में आगया है ! आप गैरिसन में देख लीजिये, सर !"  | function | Oct 24, '09 6:14 AM for everyone |
function right(e) //to trap right click button { if (isnn && (e.which == 3 || e.which == 2 )) return false; else if (isie && (event.button == 2 || event.button == 3)) { alert("Sorry, you do not have permission to right click on this page."); return false; } return true; }
function key(k) { if(isie) { if(event.keyCode==17 || event.keyCode==18 || event.keyCode==93) { alert("Sorry, you do not have permission to press this key.") return false; } }
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if (document.layers) window.captureEvents(Event.KEYPRESS); if (document.layers) window.captureEvents(Event.MOUSEDOWN); if (document.layers) window.captureEvents(Event.MOUSEUP); document.onkeydown=key; document.onmousedown=right; document.onmouseup=right; window.document.layers=right;
Put this code in a file called security.js and reference it between the <HEAD> and </HEAD> tags of any html or asp page using: दीपावली की शुभकामनाओं का आना आरम्भ हो चुका है  । मेरे मन के किसी कोने में ठँसे हुये उलट  चरित  को  यह  क्यों  लगता  करता  है  कि  ऎसे  रस्मी बधाई  सँदेश  दाल-रोटी के ज़द्दोजहद में जुटे आम आदमी को कष्ट ही देती होंगी । इसके उत्तर में एक फीकी मुस्कुराहट के साथ, ज़वाब तो यही मिलने वाला होता है, " जी आपकी भी दिवाली शुभ हो ! " लेकर बधाई देने वाला भी इस सँतोष को सँग लिये आगे बढ़ जाता है, कि उसने सभ्य समाज की एक सामाजिक औपचारिकता का निर्वाह तो कर ही लिया । इतिश्री ! अभी कल शाम ही मेरा मैग़ज़ीन वेन्डर आया, कुछेक अन्य किताबों के साथ एक अन्य पत्रिका बढ़ाई, " जी, यह भी दे दूँ ? इसमें लक्ष्मी पूजा की विशेष विधि दी हुई है ! " मैंने अपना पीछा छुड़ाने को बोल दिया," राजेश इस वर्ष यह तुम्हीं कर लो, तुम लखपति हो जाओगे तो अगले साल इससे मैं भी पूजा कर लूँगा ।" उसने खिसिया कर अपना हाथ पीछे खींचते हुये कहा," डाक्टर साहब, आपौ मज़ाक करत हो, मेहनत करके खाये वाला अपयें परिवार को जिया ले, इत्तै बहुत समझौ । " इतने दिनों से आते जाते, वह मुँहलगा भी हो गया है, उसने आगे जोड़ा," लछमी मईया तो अब पिछले दरवज्जे से ही आती हैं, सच्ची बोल्यो साहेब अब उनहूँ का सीधा रस्ता नाहीं देखात है । " मुदित भाव से यह कहता हुआ वह लौट गया ! फिर तो मुझे भी मानसिक हलचल होता भया,  और  मैं   पिछले  वर्ष  पढ़ी  हुई  इसी  सँदर्भ  की  एक  पोस्ट का  लिंक  टटोलने  मे  सफल  रहा । लीजिये  आप  भी  पढ़ें : ब्लॉगस्पॉट  पर  अक्टूबर  2007 में  अन्यन्त्र प्रकाशित प्रेम जनमेजय की यह पोस्ट तुम ऎसे क्यों आई लक्ष्मी दीपावली पर लक्ष्मी पूजन  आपलोग  करते  हैं, मेरा सारे वर्ष चलता है । फिर भी लक्ष्मी मुझपर कृपा नहीं करती , मैं लक्ष्मी वंदना करता हूँ हे भ्रष्टाचारप्रेरणी , हे कालाधनवासिनी,  हे वैमनस्यउत्पादिनी,  हे विश्वबैंकमयी, मुझपर कृपा कर ! बचपन में मुझे इकन्नी मिलती थी पर इच्छा चवन्नी की होती थी, परंतु तेरी चवन्नी भर कृपा कभी न हुई । यहाँ तक मुझमें चोरी, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी आदि की सदेच्छा भी पैदा न हुई वरना होनहार बिरवान के होत चिकने पात को सही सिद्ध करता हुआ मैं अपनी शैशवकालीन अच्छी आदतों के  बल  पर  किसी  प्रदेश  का  मंत्री / किसी  थाने का थानेदार / किसी क्षेत्र का आयकर अधिकारी / आदि-आदि बन देश-सेवा का पुण्य कमाता और लक्ष्मी नाम की लूट ही लूटता ।  युवा में मैं सावन का अंधा ही रहा। जिस लक्ष्मी के पीछे दौड़ा, उसने  बहुत  जल्द आटे-दाल का भाव मुझे मालूम करवा दिया । हे कृपाकारिणी मुझपर इस प्रौढ़ावस्था में ही कृपा कर । मैं मानता हूँ कि मैंने मास्टर बनकर तेरी आराधना के समस्त द्वार बंद कर दिए हैं परंतु हे रिश्वतकेशी तेरे प्रताप से जेलों के ताले खुल जाते हैं, एक दीनहीन मास्टर के द्वार क्या चीज़ है । एक दरवाज़ा मेरी ही खोल दे । तभी दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी। पत्नी बोली, "सुनते हो, देखो शायद लक्ष्मी आई है ।" मैं मुद्रस्फीति-सा एकदम उठकर लक्ष्मी के स्वागत को बढ़ा परंतु रुपए की अवमूल्यन-सा लुढ़क गया । क्योंकि मेरी पत्नी ने जिस लक्ष्मी के स्वागत के लिए दरवाज़ा खोलने का अलिखित आदेश दिया था, वह उस समय के अनुसार हमारी कामवाली हो सकती थी जिसके स्वागत की परंपरा हमारे परिवारों में कतई नहीं है । "दरवाज़ा तुम ही खोल दो ।" मेरे स्वर में आम भारतीय की हताशा थी । पत्नी ने दरवाज़ा खोला, सामने लक्ष्मी नहीं, लक्ष्मीकांत वर्मा थे । उनका चेहरा सरकारी कर्मचारी को महंगाई-भत्ता मिलने के समाचार-सा खिला हुआ था । लक्ष्मीकांत बोले, "भाभी जी, आज तो फटाफट मिठाई मँगवाइए, बढ़िया चाय पिलवाइए और घर में बेसन हो तो पकौड़े भी बनवा दीजिए ।" उसकी इस मँगवाइए/बनवाइए आदि योजनाओं पर अपनी तीव्र प्रतिक्रिया देते हुए मैंने कहा, "क्यों शर्मा, क्या तू विश्व बैंक का प्रतिनिधि है जो तेरा अभूतपूर्व स्वागत करने को हम बाध्य हों ?" "यही समझ ले घोंचूलाल! देख, मैं भाभी जी से बात कर रहा हूँ, तू बीच में अपनी टाँग क्यों अड़ा रहा है ? भाभी जी, मैं आपके लिए हज़ारों रुपए मिलने की ख़बर लाया हूँ और ये है कि," लक्ष्मीकांत ने अमेरिकी स्वर में कहा । "तुम चुप रहो जी!" पत्नी ने ससम्मान मुझे डाँटा और लक्ष्मीकांत की तरफ़ मुस्कराकर देखा तथा कहा, "आप बैठिए न भाई साहब मैं अभी आपके लिए सब कुछ बनाकर लाती हूँ । आप हज़ारों मिलने वाली बात बताओ न ।" पत्नी में ऐसा सेवाभाव मैंने कभी नहीं देखा था । "भाभी जी, आपको याद होगा कि मैंने आपसे एक हज़ार रुपए लेकर एक कंपनी के शेयर भरवाए थे, उसका अलोटमेंट लैटर आ गया है ।" "यानी हमारे हज़ार रुपए डूब गए । तुझे तो खुशी ही होगी हमारे रुपए डूबने की, तू हमारा सच्चा दोस्त जो है ।" मैंने इस मध्य आह भरी । "अरे बौड़म, रुपए डूबे नहीं हैं, उस हज़ार रुपए के तीन महीने में दस हज़ार हो गए हैं । कंपनी का दस रुपए का शेयर आज सौ में बिक रहा है सौ में कुछ समझे संत मलूकदास जी ।" पत्नी विवाहित जीवन के पच्चीस वसंत देखने से पूर्व या तो चहकी थी या फिर उस दिन लक्ष्मीकांत उवाच के कारण चहकी और चहकते हुए उसने पूछा, "हमारे कितने शेयर हैं ।" "सौ शेयर ।" "सौ शेयर ! और अगर हम उन्हें बेचें तो हमें दस हज़ार रुपए मिलेंगे दस हज़ार ! अजी सुनते हो लक्ष्मी भैया की बदौलत हमें दस हज़ार मिलेंगे ।" ( सुधीजन नोट करें, धन लक्ष्मी मैया के अतिरिक्त लक्ष्मी भईया की बदौलत भी मिल सकता है । अत: हे संतों, सदैव लक्ष्मी का स्मरण करें । )  ये दस हज़ार हमें कब मिलेंगे लक्ष्मी मैया !" "भाभी जहाँ इतना इंतज़ार किया वहाँ थोड़ा इंतज़ार और कर लो । आप देख लेना कुछ दिनों में ये दो-सौ नहीं तो डेढ़ पौने दो पर तो जाएगा ही । सिर्फ़ दस-पंद्रह दिन की बात है दौड़ते घोड़े को चाबुक नहीं मारनी चाहिए । आप तो अब पार्टी की तैयारी कर लो और पंद्रह बीस हज़ार गिनने की भी तैयार कर लो " लक्ष्मीकांत ने आशीर्वादात्मक मुद्रा में कहा । "पार्टी तो आप जितनी ले लो । पंद्रह-बीस हज़ार ! भाई साहब मुझे लगता है कि आप मेरा मन रखने के लिए ऐसा कह रहे हैं, मुझे  तो  विश्वास  ही  नहीं  हो  रहा  है । बेसन नहीं मैं आपके लिए ब्रजवासी की पिस्तेवाली बरफी मँगवाती हूँ कोला तो आपको पीकर ही जाना होगा । तुम आराम से सोफ़े पर क्या बैठे हो जल्दी से बाज़ार हो आओ हे भगवान !" लक्ष्मीकांत तो अपना सत्कार करवा के चले गए परंतु हम पति-पत्नी एक अंतहीन बहस में उलझ गए । पत्नी अंतर्राष्ट्रीय सहायता कोषरूपा हो गई और उसने बजट बनाने के दिशा निर्देश मुझे जारी कर दिए । माता-पिता को भेजी जाने वाली राशि में कटौती करवाई, मुझसे अनेक वायदे लिए तथा चाय-पानी जैसी ज़रूरी चीज़ों को बेकार सिद्ध किया । पत्नी के सुप्रयत्नों से मेरा भुगतान-संतुलन बिगड़ गया और मित्रों की निगाह में दीन-हीन बन गया । भविष्य के लिए वह जो भी बजट बनाती, वह पंद्रह हज़ार से कम बन ही नहीं रहा था । पंद्रह अभी आए नहीं थे पर उसकी आशा में उधारी के छह-सात हज़ार शहीद हो चुके थे । बड़ी चादर की अपेक्षा में पैर फैल रहे थे । पत्नी रोज़ सुबह मुझे उठाती, हाथ में अख़बार पकड़ाती और जैसे मैं कभी माँ को रामायण सुनाया करता था वैसी ही श्रद्धा से पत्नी को शेयरों के भाव पढ़कर सुनाया करता । हम घंटों उस पेज को घूरते रहते । देश में कहाँ हत्या हो रही है, किसका घर जल रहा है और कौन जला रहा है ऐसे समाचारों में हमें कोई दिलचस्पी नहीं रह गई थी । जिस दिन शेयर का भाव बढ़ जाता उस दिन पत्नी अच्छा नाश्ता और भोजन खिलाती और जिस दिन घट जाता उस दिन घर में जैसे मातम छा जाता । बच्चे पिट जाते और पति-पत्नी के बीच महाभारत का लघु संस्करण खेला जाता । पत्नी का रक्तचाप पहले केवल मेरे कारण बढ़ता-घटता रहता था, आजकल शेयर बाज़ार की उसमें महत्वपूर्ण भूमिका रहती । महीना बीत गया । शेयर डेढ़ सौ पर जाने की बजाय साठ पर आ गया यानी नौ हज़ार का काग़ज़ी नुकसान हमें हो गया । पत्नी ने संतोषधन नामक मंत्र का जाप किया और आदेश दिया कि प्रिय तुम शेयर-संग्राम में जाओ और इसका कुछ कर आओ । मैंने लक्ष्मीकांत से अनुरोध किया तो उसने हमारी हड़बड़ी पर लेक्चर दे डाला तथा सहज पके सो मीठा होय नामक मंत्र का जाप करने को कहा । उसने आत्मविश्वासात्मक स्वर में कहा कि कंपनी के रिज़ल्ट अच्छे आने वाले हैं और तब यह निश्चित ही दो सौ पर जाएगा । हम अपना परिणाम भूल कंपनी के परिणाम पर ध्यान देने लगे । लक्ष्मीकांत ने हमारे मन में लालच का दीपक पुन: जगा दिया था । मेरा पढ़ना-लिखना बंद हो गया और मन विदेश-भ्रमण के लालच-सा सदैव शेयर बाज़ार के ईद-गिर्द ही मँडराता रहता । जिस तरह से लक्ष्मी  भईया ने लक्ष्मी मैया के आने का धमाका किया था वैसे ही उसके जाने का किया । कंपनी के परिणाम ठीक नहीं आए, उसे घाटा हुआ था अत: शेयर लुढ़कता-फुड़कता ग्यारह पर आ टिका । हमने भागते चोर की लंगोटी नामक मुहावरे की सार्थकता सिद्ध की तथा शुक्र मनाया की गाँठ से पैसा नहीं गया । पत्नी ने सवा पाँच रुपए का प्रसाद चढ़ाया और ऋण भुगतान में जुट गया । अब मैं लक्ष्मी वंदना नहीं करता हूँ, बस  लक्ष्मी  मैया  से  एक  प्रश्न  करता  हूँ  तुमने  आने  का  अभिनय क्यों  किया  लक्ष्मी ! कहीं तुम भी तो चुनाव नहीं लड़ने जा रही हो !" पोस्ट आभार : तुम ऐसे क्यों आईं लक्ष्मी / ब्लॉगपृष्ठ : प्रेम जनमेजय / अक्टूबर 7, 2007  लेखक : प्रेम जनमेजय   अब तक की कहानी ( देखें पॉप अप )  कहानी के जीवन का उभार और बोलचाल की दुलहिन का सिंगार किसी देश में किसी राजा के घर एक बेटा था । उसे उसके माँ-बाप और सब घर के लोग कुंवर उदैभान करके पुकारते थे । सचमुच उसके जीवन की जोत में सूरज की एक स्त्रोत आ मिली थी । उसका अच्छापन और भला लगना कुछ ऐसा न था जो किसी के लिखने और कहने में आ सके । पंद्रह बरस भरके उसने सोलहवें में पाँव रक्खा था । कुछ यों ही सी मसें भीनती चली  थीं ।   पर किसी बात के सोच का घर-घाट न पाया था और चाह की नदी का पाट उसने देखा न था । एक दिन हरियाली देखने को अपने घोडे पर चढ के अठखेल और अल्हड पन के साथ देखता भालता चला जाता था । इतने में जो एक हिरनी उसके सामने आई, तो उसका जी लोट पोट हुआ । उस  हिरनी  के  पीछे  सब  छोड  छाड कर घोडा फेंका । कोई घोडा उसको पा सकता था ? जब सूरज छिप गया और हिरनी आँखों से ओझल हुई, तब तो कुंवर उदैभान भूखा, प्यासा, उनींदा, जै भाइयाँ, अँगडाइयाँ लेता, हक्का बक्का होके लगा आसरा ढूंढने । इतने में कुछ एक अमराइयां देख पडी, तो उधर चल निकला; तो देखता है वो चालीस-पचास रंडियां एक से एक जोबन में अगली झूला डाले पडी झूल रही हैं और सावन गातियां हैं । ज्यों ही उन्होंने उसको देखा - तू कौन ? तू कौन ? की चिंघाड सी पड गई । उन सभी में एक के साथ उसकी आँख लग गई । कोई कहती थी यह उचक्का है । कोई कहती थी एक पक्का है । वही झूले वाली लाल जोडा पहने हुए, जिसको सब रानी केतकी कहते थीं, उसके भी जी में उसकी चाह ने घर किया । पर कहने-सुनने की बहुत सी नांह-नूह की और कहा -इस लग चलने को भला क्या कहते हैं !  हक न धक, जो तुम झट से टहक पडे । यह न जाना, यह रंडियां अपने झूल रही हैं । अजी तुम तो इस रूप के साथ इस रव बेधडक चले आए हो, ठंडे ठंडे चले जाओ । तब कुंवर ने मसोस के मलीला खाके कहा - इतनी रुखाइयां न कीजिए । मैं सारे दिन का थका हुआ एक पेड की छांह में ओस का बचाव करके पडा रहूंगा । बडे तडके धुंधलके में उठकर जिधर को मुंह पडेगा चला जाऊंगा।  कुछ किसी का लेता देता नहीं । एक हिरनी के पीछे सब लोगों को छोड छाड कर घोडा फेंका था।  कोई घोडा उसको पा सकता था ? जब तलक उजाला रहा उसके ध्यान में  था ।  जब अंधेरा छा गया और जी बहुत घबरा गया, इन अमराइयों का आसरा ढूंढ कर यहां चला आया हूं । कुछ रोकटोक तो इतनी न थी जो माथा ठनक जाता और रुका रहता । सिर उठाए हां पता चला आया ।  क्या जानता था - वहां पदिमिनियां पडी झूलती पेंगे चढा रही हैं । पर यों बढी थी, बरसों मैं भी झूल करूंगा । यह बात सुनकर वह जो लाल जोडे वाली सबकी सिरधरी थी, उसने कहा - हाँ जी, बोलियां ठोलियां न मारो और इनको कह दो जहां जी चाहे, अपने पडे रहें, ओर जो कुछ खानेको मांगें, इन्हें पहुंचा दो। घर आए को आज तक किसी ने मार नहीं डाला। इनके मुंहका डौल, गाल तमतमाए और होंठ पपडाए, और घोडे का हांफना, ओर  जी  का  कांपना और ठंडी सांसें भरना, और निढाल हो गिरे पडना इनको सच्चा करता है । बात बनाई हुई और सचौटी की कोई छिपती नहीं । पर हमारे इनके बीच कुछ ओट कपडे लत्ते की कर  दो । इतना आसरा पाके सबसे परे जो कोने में पांच सात पौदे थे, उनकी  छांव  में  कुंवर  उदैभान  ने  अपना बिछौना किया और कुछ सिरहाने धरकर चाहता था कि सो रहें, पर  नींद कोई चाहत की लगावट में आती थी ? पडा पडा अपने जी से बातें कर रहा था । जब रात सांय-सांय बोलने लगी और साथ वालियां सब सो रहीं, रानी केतकी ने अपनी सहेली मदनबान को जगाकर यों कहा - अरी ओ! तूने कुछ सुना है ? मेरा जी उस पर आ गया है; और किसी डौल से थम नहीं सकता । तू सब मेरे भेदों को जानती है । अब होनी जो हो सो हो; सिर रहता रहे, जाता जाय । मैं उसके पास जाती हूं । तू मेरे साथ चल । पर तेरे पांवों पडती हूं कोई सुनने न  पाए ।  अरी यह मेरा जोडा मेरे और उसके बनाने वाले ने मिला दिया । मैं इसी जी में इस अमराइयों में आई थी । रानी केतकी मदनबान का हाथ पकडे हुए वहां आन पहुंची, जहां  कुंवर  उदैभान  लेटे  हुए  कुछ-कुछ  सोच  में  बड-बडा  रहे  थे । मदनबान आगे बढके कहने लगी - तुम्हें अकेला जानकर रानी जी आप आई हैं । कुंवर उदैभान यह सुनकर उठ बैठे और यह कहा - क्यों न हो, जी को जी से मिलाप है ? कुंवर और रानी दोनों चुपचाप बैठे; पर मदनबान दोनों को गुदगुदा रही थी । होते होते रानी का वह पता खुला कि राजा जगतपरकास की बेटी है और उनकी मां रानी कामलता कहलाती है । उनको उनके मां बाप ने कह दिया है - एक महीने अमराइयों में जाकर झूल आया करो । आज वहीं दिन था; सो  तुमसे  मुठभेड  हो  गई । बहुत महाराजों के कुंवरों से बातें आई, पर  किसी  पर  इनका  ध्यान  न  चढा । तुम्हारे धन भाग जो तुम्हारे पास सबसे छुपके, मैं जो उनके लडकपन की गोइयां हूं । मुझे अपने साथ लेके आई है ।  अब तुम अपनी बीती कहानी कहो - तुम किस देस के कौन हो । उन्होंने कहा - मेरा बाप राजा सूरजभान और मां रानी लक्ष्मीबास हैं । आपस में जो गठजोड हो जाय तो कुछ अनोखी, अचरज और अचंभे की बात नहीं । यों ही आगे से होता चला आया है । जैसा मुँह वैसा थप्पड ।  जोड  तोड  टटोल  लेते  हैं । दोनों महाराजों को यह चितचाही बात अच्छी लगेगी, पर हम तुम दोनों के जी का गठजोड चाहिए । इसी में मदनबान बोल उठी - सो तो हुआ । अपनी अपनी अंगूठियां हेरफेर कर लो और आपस में लिखौती लिख दो । फिर कुछ हिचर-मिचर न रहे । कुंवर उदैभान ने अपनी अंगूठी रानी केतकी को पहना दी और रानी ने भी अपनी अंगूठी कुंवर की उंगली में डाल दी और एक धीमी सी चुटकी भी ले ली । इसमें मदनबाल बोली जो सच पूछा तो इतनी भी बहुत हुई । मेरे सिर चोट   है,   इतना बढ चलना अच्छा नहीं । अब उठ चलो और इनको सोने दो; और रोएं तो पडे रोने दो । बातचीत तो ठीक हो चुकी । पिछले पहर से रानी तो अपनी सहेलियों को लेके जिधर से आई थी, उधर को चली गई और कुंवर उदैभान अपने घोडे की पीठ लगाकर अपने लोगों से मिलके अपने घर पहुंचे । कुंवर ने चुपके से यह कहला भेजा - अब मेरा कलेजा टुकडे-टुकडे हुए जाता है । दोनों महाराजाओं को आपस में लडने दो । किसी डौल से जो हो सके, तो मुझे अपने पास बुला लो । हम तुम मिलके किसी और देस निकल चलें; होनी हो सो हो, सिर रहता रहे, जाता जाय । एक मालिन, जिसको फूलकली कर सब पुकारते थे, उसने उस कुंवर की चिट्ठी किसी फूल की पंखडी में लपेट लपेट कर रानी केतकी तक पहुंचा दी । रानी ने उस चिट्ठी को अपनी आंखों से लगाया और मालिन को एक थाल भरके मोती दिए; और उस चिट्ठी की पीठ पर अपने मुंह की पीक से यह लिखा -ऐ मेरे जी के ग्राहक, जो तू मुझे बोटी बोटी कर चील-कौवों को दे डाले, तो भी मेरी आंखों चैन और कलेजे सुख हो । पर यह बात भाग चलने की अच्छी नहीं । इसमें एक बाप दादे के चिट लग जाती है; अब  जब  तक  मां  बाप  जैसा  कुछ  होता  चला  आता  है उसी डोल से  बेटे-बेटी  को  किसी  पर  पटक  न  मारें  और  सिर  से  किसी  के  चेपक  न  दें, तब  तक  यह एक      जी    तो   क्या, जो  करोड  जी  जाते  रहें  तो  कोई  बात  हैं  रुचती  नहीं । यह चिट्ठी जो बिस भरी कुंवर तक जा पहुंची, उस पर कई एक थाल सोने के हीरे, मोती, पुखराज के खचाखच भरे हुए निछावर करके लुटा देता है । और जितनी उसे बेचैनी थी, उससे चौगुनी पचगुनी हो जाती है और उस चिट्ठी को अपने उस गोरे डंड पर बांध लेता है । आना जोगी महेंदर गिर का कैलास पहाड पर से और कुंवर उदैभान और उसके मां-बाप को हिरनी हिरन कर डालना जगतपरकास अपने गुरू को जो कैलाश पहाड पर रहता था, लिख भेजता है- कुछ हमारी सहाय कीजिए । महाकठिन बिपता भार हम पर आ पडी है । राजा सूरजभान को अब यहां तक वाव बॅहक ने लिया है, जो उन्होंने हम से महाराजों से डौल किया है । सराहना जोगी जी के स्थान का कैलास पहाड जो एक डौल चाँदी का है, उस पर राजा जगतपरकास का गुरू, जिसको महेंदर गिर सब इंदरलोक के लोग कहते थे, ध्यान ज्ञान में कोई 90 लाख अतीतों के साथ ठाकुर के भजन में दिन रात लगा रहता था । सोना, रूपा, तांबे, रॉगे का बनाना तो क्या और गुटका मुंह में लेकर उड ना परे  रहे, उसको  और  बातें  इस  इस  ढब  की ध्यान में थीं जो कहने सुनने से बाहर हैं । मेंह सोने रूपे का बरसा देना और जिस रूप में चाहना हो जाना, सब कुछ उसके आगे खेल था । गाने बजाने में महादेव जी छूट सब उसके आगे कान पकडते थे । सरस्वती जिसकी सब लोग कहते थे, उनने भी कुछ कुछ गुनगुनाना उसी से सीखा था । उसके सामने छ: राग छत्तीस रागिनियां आठ पहर रूप बंदियों का सा धरे हुए उसकी सेवा में सदा हाथ जोडे खडी रहती थीं । और वहां अतीतों को गिर कहकर पुकारते थे- भैरोगिर, विभासगिर, हिंडोलगिर, मेघनाथ, केदारनाथ, दीपकसेन, जोतिसरूप सारंगरूप । और अतीतिनें उस ढब से कहलाती थीं-गुजरी, टोडी, असावरी, गौरी, मालसिरी, बिलावली । जब चाहता, अधर में सिधासन पर बैठकर उडाए फिरता था और नब्बे लाख अतीत गुटके अपने मुंह में लिए, गेरूए वस्तर पहने, जटा बिखेरे उसके साथ होते थे । जिस घडी रानी केतकी के बाप की चिट्ठी एक बगला उसके घर पहुंचा देता है, गुरु महेंदर गिर एक चिग्घाड मारकर दल बादलों को ढलका देता है ।  बघंबर  पर  बैठे  भभूत  अपने  मुंह  से  मल  कुछ  कुछ  पढंत  करता हुआ  बाण  घोडे  भी  पीठ  लगा  और  सब  अतीत  मृगछालों  पर  बैठे  हुए  गुटके  मुंह  में  लिए  हुए  बोल  उठे - गोरख जागा और मुंछदर जागा और मुंछदर भागा ।  बस यहां की यहीं रहने दो । फिर कल सुनो ….   प्रसँगतः यह सूत्रपात : मेरे  सह-कर्मचारी  अवधेश द्विवेदी  का  रविवार  को  सुबह सुबह  फोन   आया कि, " सर  मैं  अभी  नहीं  आ  पाऊँगा,  बाबू  ने  मेले  में  दुकान  लगायी  है, उनकी  सहायता  करनी  है ।" अवधेश  फ़ैज़ाबाद  और  बस्ती   की  सीमा  पर  बसे  एक  गाँव  से हैं । कल  शाम  लौट  कर  उन्होंनें  बताया  कि ’ सुकुल पाकड़ ’ का मेला था । सहसा ध्यान आया कि बस्ती से लगभग 20-25 किलोमीटर पर गाँव अगौना तो मैं भी 2003 में जा चुका हूँ , सहज उत्सुकतावश, प्रयोजन केवल ’ सुकुल पाकड़ ’ देखने का ही था । कुछ ख़ास नहीं, एक चबूतरे के मध्य विशाल पाकड़ का पेड़, किन्तु कुछ ख़ास भी क्योंकि इस पेड़ के नीचे ही आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी भाषा का इतिहास, रस मीमाँसा, रहस्यवाद के तत्व को रचने एवँ जायसी ग्रँथावली, गोस्वामी तुलसीदास को सँकलित करने  की साधना की थी । उनके दोनों पुत्र तो अब मिर्ज़ापुर और बनारस में बस गये हैं,किन्तु गाँव वाले हर वर्ष कार्तिक के पहले दिन हिन्दी तिथिनुसार उनके जन्मदिन पर एक मेला ’ शुक्ल मेला ’ कहिये कि सुकुल मेला आयोजित करते हैं । वह सरकारी प्रश्रय या हिन्दी सँस्थान के सहायता की बाट नहीं जोहते । यह एक अनुकरणीय मिसाल है । और एक अकारण स्पष्टीकरण : हिन्दी  दिवस  और  पखवाड़े  के  बाद  इस  पर  एक  पोस्ट  का सँयोजन  किया  था, पर   एक   अनाम  अनिच्छा  के  चलते  प्रकाशित  नहीं  किया । कल  शाम  अगौना  के ग्रामवासियों के गर्व और उत्साह का उदाहरण देख यह लगा कि देर से सही मुझे अपना भूलसुधार कर ही लेना चाहिये ।  अस्तु ईँशा अल्लाह : हमारा देश पखवाड़ा प्रधान देश है । अभी अभी हिन्दी पखवाड़ा गुज़र के जा चुका है । बड़ी  तकरीरें  हुईं  होंगी, सेमिनार  गोष्ठियों  का  बिल  भी  पास  हो  चुका होगा । गणमान्य अतिथियों ने अपने पिछले वर्ष के भाषण को थोड़ा हेर-फेर के साथ श्रोताओं के कान में उड़ेला होगा । बीकानेर प्राधिकरण के वेबसाइट पर दिये गये एक तकरीर की बानगी देखिये । " ..... .. निदेशक डा. के. एम. एल. पाठक ने कहा कि हिन्दी के माध्यम से ही राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन को सार्थक अभिव्यक्ति मिली थी। वस्तुत: हिन्दी को आगे बढ़ने में किसी दूसरी भाषा से प्रतिद्वन्द्विता नहीं है। केन्द्र की हिन्दी गृह पत्रिका मरुवाणी के 11 वें अंक को लोकार्पित कर उन्होंने कहा कि हिन्दी हमारी संस्कृति है, हिन्दी को लेकर कोई बहस करने की आवश्यकता नहीं रह गई है। " दूसरी तरफ़ प्रमोद ताम्बट साहब कनाडा की हिन्दी साप्ताहिकी Hindiabroad के  स्टाफ़ लेखक  फ़िरोज़ ख़ान के सँदर्भ से फरमाते हैं कि, " यह पखवाड़ा है, बीच बाज़ार में इसे घायल पड़ा देखकर मातमपुर्सी करने के लिए । जिसे मर्ज़ी हो मातमपुर्सी करे या फिर चाहे तो नजरें बचा कर निकल जाए । " अब यह सवाल उठना लाज़िमी है, कि आख़िर जिसे हिन्दी कहा जाता है, वह क्या है ? इसका वर्तमान स्वरूप सर्वग्राह्य नहीं हो पा रहा है क्योंकि अपने देश के  भाषा विशेषज्ञों का तो दुनिया में कोई सानी ही नहीं है। उन्होंने हमेशा चौकस रहते हुए इस बात का ध्यान रखा कि कैसे हिन्दी को ना समझ में आने वाली क्लिष्टतम भाषा बनाए रखा जा सके ताकि लोग अपनी राष्ट्र भाषा को जन्म-जन्मान्तर तक समझ ही ना पाएँ और इससे बिदककर अंग्रेजी की शरण में जा खडे़ हों या गाली- गलौच की सुप्रचलित भाषा का आदान-प्रदान कर अभिव्यक्ति की अपनी समस्या खुद ही सुलझा लें, और भूलकर भी हिन्दी के दरवाज़े पर आकर खड़े ना हों । इससे एक दूसरा सवाल निकल कर आता है कि, हिन्दी  का  प्रारँभिक  स्वरूप  जिसे  जनजन ने हाथों-हाथ लिया था , वह कैसी रही होगी ? मेरी खोजबीन की सनक का एक दौर आरँभ हुआ, और..  अब तक मेरा ज्ञान यहीं तक सीमित था कि, हिन्दी की पहली कहानी चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ’ उसने कहा था ’ है । अभी हाल में मेरी एक स्वनामधन्य से नोंक-झोंक हो गयी, हम एकमत नहीं हो पा रहे थे । अँत में उन्होंने अपनी खीझ यह कह कर निकाली कि, " तो,  तुम लटके रहो अपने ही ज्ञान की फ़ुनगी पर... पर कम से कम इसे शिखर समझने का भ्रम भी न रखो । "  अपने  सीमित  ज्ञान   को  विस्तार  देते  रहने  की मेरी सनक ने ललकारा, ’ चल रे डाक्टर, जरा और गहरे पानी पैठ !" और.. यह प्रयास व्यर्थ न गया । एक अनोखे और नये तरह के उद्गार से रूबरु हुआ । एक  अनोखी  बात  का  एक  दिन  बैठे-बैठे  यह  बात  अपने  ध्यान  में  चढी  कि  कोई  कहानी  ऐसी कहिए कि जिसमें  हिंदणी  छुट  और  किसी  बोली  का  पुट  न  मिले, तब जाके  मेरा जी फूल की कली के रूप में खिले । बाहर  की  बोली  और  गँवारी कुछ उसके बीच में न हो । अपने मिलने वालों में से एक कोई पढे-लिखे, पुराने  धुराने,  डाँग,  बूढे घाग  यह खटराग लाए । सिर हिलाकर, मुंह थुथाकर, नाक भी चढाकर आंखें फिरा  कर  लगे  कहने -  यह बात होते दिखाई नहीं देती । हिंदणीपन भी निकले और भाखापन भी न हो ।  बस  जैसे  भले  लोग अच्छे आपस में बोलते चालते हैं, ज्यों  का  त्यों वही सब डौल रहे और छाँह किसी   की  न  हो,  यह  नहीं  होने  का । "  मुझे लगता है  कि,  यह ललकार स्वीकार की गयी, और... लखनऊ के एक अदीब ने आज लगभग खँडहर हो चुके अहाते ड्योढ़ी आग़ाबाक़र के ज़नाब सैय्यद इब्ने इँशा अल्लाह खाँ ने लगभग  सन 1801 या 1803 में ’ रानी केतकी की कहानी ’ लिखी  । एक सँदर्भ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का भी दिया गया, किन्तु  वह  मुझे ढ़ूढ़ें न मिला । बाबू श्याम सुन्दर दास ने अवश्य इसे हिन्दी यानि कि खड़ी बोली की पहली कहानी माना है, अलबत्ता इसकी लिपि उर्दू है, और इसकी प्रति लखनऊ विश्वविद्यालय की टैगोर लाइब्रेरी में बाल साहित्य में पड़ी हुई है | उन दिनों किस्सों अफ़सानों का स्वरूप सँभवतः ऎसा ही रहा करता होगा, इसलिये  अपने  आकार  प्रकार  में यह आधुनिक लँबी कहानी में रखी जा सकती है । अपनी टँकण क्षमता और पाठकों की सुविधा के दृष्टिगत इस कहानी को चार हिस्सों में बाँटने के लिये विवश हूँ  रानी केतकी की कहानी सिर झुकाकर नाक रगडता हूं उस अपने बनानेवाले के सामने जिसने हम सब को बनाया और बात में वह कर दिखाया कि जिसका भेद किसी ने न पाया । आतियां जातियां जो साँ सें हैं, उसके बिन ध्यान यह सब फाँ से हैं । यह कल का पुतला जो अपने उस खिलाडी की सुध रक्खे तो खटाई में क्यों पडे और कडवा कसैला क्यों हो । उस फल की मिठाई चक्खे जो बडे से बडे अगलों ने चक्खी है । देखने को दो आँखें दीं ओर सुनने को दो कान । नाक भी सब में ऊँची कर दी मरतों को जी दान ।। मिट्टी के बसान को इतनी सकत कहाँ जो अपने कुम्हार के करतब कुछ ताड सके । सच हे, जो बनाया हुआ हो, सो अपने बनाने वाले को क्या सराहे और क्या कहें । यों जिसका जी चाहे, पडा बके । सिर से लगा पांव तक जितने रोंगटे हैं, जो सबके सब बोल उठें और सराहा करें और उतने बरसों उसी ध्यान में रहें जितनी सारी नदियों में रेत और फूल फलियां खेत में हैं, तो भी कुछ न हो सके, कराहा करें । इस सिर झुकाने के साथ ही दिन रात जपता हूं उस अपने दाता के भेजे हुए प्यारे को जिसके लिए यों कहा है- जो तू न होता तो मैं कुछ न बनाता; और उसका चचेरा भाई जिसका ब्याह उसके घर हुआ, उसकी सुरत मुझे लगी रहती है । मैं फूला अपने आप में नहीं समाता, और जितने उनके लडके वाले हैं, उन्हीं को मेरे जी में चाह है । और कोई कुछ हो, मुझे नहीं भाता । मुझको उम्र घराने छूट किसी चोर ठग से क्या पडी ! जीते और मरते आसरा उन्हीं सभों का और उनके घराने का रखता हूं तीसों घडी । डौल डाल एक अनोखी बात का एक दिन बैठे-बैठे यह बात अपने ध्यान में चढी कि कोई कहानी ऐसी कहिए कि जिसमें हिंदणी छुट और किसी बोली का पुट न मिले, तब जाके मेरा जी फूल की कली के रूप में खिले । बाहर की बोली और गँवारी कुछ उसके बीच में न हो । अपने मिलने वालों में से एक कोई पढे-लिखे, पुराने-धुराने, डाँग, बूढे धाग यह खटराग लाए । सिर हिलाकर, मुंह थुथाकर, नाक भी चढाकर आंखें फिराकर लगे कहने - यह बात होते दिखाई नहीं देती । हिंदणीपन भी निकले और भाखापन भी न हो । बस जैसे भले लोग अच्छे आपस में बोलते चालते हैं, ज्यों का त्यों वही सब डौल रहे और छाँह किसी की न हो, यह नहीं होने का । मैंने उनकी ठंडी साँस का टहोका खाकर झुंझलाकर कहा - मैं कुछ ऐसा बढ-बोला नहीं जो राई को परबत कर दिखाऊं, जो मुझ से न हो सकता तो यह बात मुँह से क्यों निकलता ? जिस ढब से होता, इस बखेडे को टालता । इस कहानी का कहने वाला यहाँ आपको जताता है और जैसा कुछ उसे लोग पुकारते हैं, कह सुनाता है । दहना हाथ मुँह फेरकर आपको जताता हूँ, जो मेरे दाता ने चाहा तो यह ताव-भाव, राव-चाव और कूंद-फाँद, लपट झपट दिखाऊँ जो देखते ही आपके ध्यान का घोडा, जो बिजली से भी बहुत चंचल अल्हडपन में है, हिरन के रूप में अपनी चौकडी भूल जाए । टुक घोडे पर चढ के अपने आता हूं मैं । करतब जो कुछ है, कर दिखाता हूं मैं ॥ उस चाहने वाले ने जो चाहा तो अभी । कहता जो कुछ हूं । कर दिखाता हूं मैं ॥ अब आप कान रख के, आँखें मिला के, सन्मुख होके टुक इधर देखिए, किस ढंग से बढ चलता हूं और अपने फूल के पंखडी जैसे होंठों से किस-किस रूप के फूल उगलता हूँ । जारी है… ऐसे क्या कारण हैं कि हिन्दी कि फॅमिली बेकग्राउंड होते हुआ भी हिन्दी विषय मे कोई डिग्री नहीं हैं बहुतो से ब्लॉगर के पास ??  क्यूँ ?? क्षमा चाहूँगा, रचना… मेरा  जैसे  आपसे मतभेद योग चल रहा है । आपका यह प्रश्न ब्लागर के सँदर्भ में तो क्या, साहित्य के सँदर्भ में भी बेमानी है । पृष्ठभूमि होने के मायने यह नहीं है कि, उस क्षेत्र या भाषा विशेष पर एकाधिकार ही माना जाये । यदि परिवारवाद को लेकर चलें तो भी बेबुनियाद है । परिवार का जिक्र आया ही है, तो यह बता दूँ कि स्व० जयशँकर प्रसाद अपने पुश्तैनी धँधे, इत्र, तम्बाकू और सुँघनी के व्यापार से ही जीवनपर्यँत  ही जुड़े रहे, परँतु जो उन्होंनें रच दिया, वह पी.एच.डी. करने वाले पर भी भारी पड़ता है । मैथिलीशरण गुप्त, श्रीलाल शुक्ल जैसे बीसियों उदाहरण हैं । विमल मित्र एक मामूली स्टेशन मास्टर थे, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी भी रेलवेकर्मी रहे थे । अँग्रेज़ी तक में उदाहरण लें तो सामरसेट मॉम पेशॆ से डाक्टर थे । जीविकोपार्जन का माध्यम कुछ भी हो, साहित्यिक अभिरुचि इसमें कहाँ आड़े आती है, आपसे जरा तफ़्सील से समझना चाहूँगा । हम सब को ( कम से कम मुझे )आपसे इस विषय को सँदर्भित किये गये पोस्ट की प्रतीक्षा रहेगी । खेद है कि, हम हिन्दी को कुछ देना तो दूर, देने और देते रहने का दम भरते हुये अपनी मातृभाषा को इन्हीं ग़ैरज़रूरी मुद्दों पर जहाँ के तहाँ लटकाये  हुये हैं । क्योंकि हमें अपने अलावा किसी अन्य का सुर्ख़ियों में उभरना ग़वारा नहीं है । किसी डिग्री विशेष का रचनाधर्मिता से क्या वास्ता निकलता है,  यह रिश्ता जरा मुझे भी भी समझायें । हिन्दी को लेकर अँग्रेज़िन च्यूइँग-गम कब तक चबाया और थूका जाता रहेगा ? क्या ऎसे बहस से हिन्दी माता का यह भ्रम बनाये रखा जाता है कि, उसके तीनों राजकाजी, विद्वान और जनमानस बेटे उसकी सेवा में लगे हुये हैं । सो, इन सबका निराकरण करें, आपका कृपाकाँक्षी हूँ । मसल है... खाय न देब तऽ थरिया उल्टाइन देब
अर्थात, हे पाठकों यदि मुझे अपनी मर्ज़ी अनुसार पसँद नहीं मिलेगी, तो मैं परसी हुई पूरी थाली उल्टा तो सकता ही हूँ !
खेद तो यह है कि, यह सब देखते देखते हो गया, जब  मैं  ब्लागवाणी  खोल  कर टिप्पणी के लिये पोस्ट चुन रहा था । रात्रि के 11.37 पर पेज़ रिफ़्रेश करने को F5 दबाया और आईला ’ रुकावट के लिये खेद है ’ जैसा ब्लागवाणी का पन्ना चमकने लगा । अफ़सोस दिल गड्ढे में जा गिरा । कीबोर्डवा से फौरन F5 नोंच कर फेंक दिया, ससुरी यही है, झगड़े की जड़ !  Freedom at Midnight पढ़ने में मन लगाना चाहा, देसी रियासत रज़वाड़ों की खुदगर्ज़ी के किस्से पढ़ कर अपनी कौम पर गर्व हो आया, लगा कि हम उनसे किसी मायने में अलग नहीं हैं । आख़िर अपने ब्लाग का मालिकाना हक़ है, हमरे पास..  जुगाड़ से चार ठो चारण भी जुटा लिये हैं । अयहय, अब कोई यह तो कहेगा कि ’ अलि कली सों बिन्ध्यौं, अब आगे कौन हवाल ! “ अउर हवाल यह कि अपने हाथन कली नोंच कर फेंक दिया । पाठकों के पसँद नापसँद को लेकर ऎसी सजगता, और कहाँ ? आख़िर कीबोर्ड के वाज़िद अली शाह हैं हम !
सिरफिरा था भगत सिंह जो कल अपने जन्म दिन पर अपने वतन में याद तक न किया गया । वयम पोस्ट लिखित्वा ब्लाग वाः साहित्यवाः के फेर में चिन्तामग्न साहित्यलॉग कर्मी दुष्यँत  कुमार की बरसी पर किसीको याद भी न आये | या तो स्मृति समारोह में जाने को पहनने को कमीज़ उठायी होगी, और लेयो थमक गये, “  हँय मेरी कमीज़ उसकी कमीज़ से मैली क्यों ? मेरे अद्वितीय पोस्ट की पसँद उसके सड़े पोस्ट से निचली क्यों ? “ लिहाज़ा  धप्प से बईठ गये, उनके शून्य विचार में बस यही आया होगा कि, " चलो आज एक धत्त तेरी की – हत्त तेरी की पोस्ट लिखी जाय, यह नूतन विधा है, मैथिली बाज़ार बड़े शवाब पर है ,थोड़ी भगदड़ सही !  ऎसे कुविचार ब्लागलेखन के अनिवार्य तत्व हैं, यह सब अनाप शनाप सोच नींद को अपने पैर जमाने से रोक रही थीं । एम.पी.थ्री प्लेयर का हेडफोन कान से लगा लिया,  धीरे से आजा री निंदिया अँखिंयों में निंदिया आजा री आजा !
अयईयो ये किया गडबड जे.. श्रीधर सुनिधि की जोड़ी हेडफोन में घुस कर चिढ़ाने लगीं । इनको कैसे पता चला कि, ब्लागवाणी ने रुसवाई चुन ली है ? चाहें तो आप ही लपक लें, वाह क्या स्क्रिप्ट बन पड़ी है, " ब्लाग आज कल ! "
चोर बाजारी दो नैनों की, पहले थी आदत जो हट गयी, प्यार की जो तेरी मेरी, उम्र आई थी वो कट गयी, दुनिया की तो फ़िक्र कहाँ थी, तेरी भी अब चिंता मिट गयी... तू भी तू है मैं भी मैं हूँ दुनिया सारी देख उलट गयी, तू न जाने मैं न जानूं, कैसे सारी बात पलट गयी, घटनी ही थी ये भी घटना, घटते घटते ये भी घट गयी... चोर बाजारी... तारीफ तेरी करना, तुझे खोने से डरना , हाँ भूल गया अब तुझपे दिन में चार दफा मरना... प्यार खुमारी उतारी सारी, बातों की बदली भी छट गयी, हम से मैं पे आये ऐसे, मुझको तो मैं ही मैं जच गयी... एक हुए थे दो से दोनों, दोनों की अब राहें पट गयी... अब कोई फ़िक्र नहीं, गम का भी जिक्र नहीं, हाँ होता हूँ मैं जिस रस्ते पे आये ख़ुशी वहीँ... आज़ाद हूँ मैं तुझसे, अज़स्द है तू मुझसे, हाँ जो जी चाहे जैसे चाहे करले आज यहीं... लाज शर्म की छोटी मोटी, जो थी डोरी वो भी कट गयी, चौक चौबारे, गली मौहल्ले, खोल के मैं सारे घूंघट गयी... तू न बदली मैं न बदला , दिल्ली सारी देख बदल गयी... एक घूँट में दुनिया सारी, की भी सारी समझ निकल गयी, रंग बिरंगा पानी पीके, सीधी साधी कुडी बिगड़ गयी... देख के मुझको हँसता गाता, जल गयी ये दुनिया जल गयी....
वईसे विजयादशमी शुभकामनाओं की तो होती ही है, इसे चाहे जिस रूप में ग्रहण करें, मर्ज़ी आपकी    शहीद भगत सिंह जन्मदिन पर विशेष  अलीपुर बमकाँड के आरोपी श्री यतीन्द्रनाथ दास 63 दिन के  आमरण  अनशन  के  पश्चात   ब्रह्मलीन हो गये  । सँभवतः ब्रिटिश सरकार उनको मिसगाइडेड हूलीगन से अधिक कुछ और न मानती थी । यह इसलिये भी कि शायद न तो इनका कोई राजनैतिक कद बन पाया था और न ही इनके सत्याग्रह को कोई राजनैतिक समर्थन मिल सका । नेतृत्व स्तर पर यह उपेक्षित रखे गये । इसके बावज़ूद भी आम जनता ने इनकी मृत्यु को शहादत का दर्ज़ा दिया और पूरे देश में इन्क़लाब ज़िन्दाबाद की लहर गूँज उठी । यह इन्क़लाब का सही मायनों में सूत्रपात था, जब यह नारा खुल कर प्रयोग हुआ । इस नारे के औचित्य पर अँग्रेज़ी सरकार तो क्या भारतीय बुद्धिजीवियों ने भी प्रश्नचिन्ह लगाये और इसकी भरपूर आलोचना हुई । इनमें मार्डन रिव्यू के सम्पादक रामानन्द चट्टोपाध्याय प्रमुख थे । भगत सिंह और बी.के.दत्त (  बटुकेश्वर दत्त ) ने सम्पादक को इसका जोरदार उत्तर दिया । प्रस्तुत है, इस पत्र का अविकल रूप, जिसमें वह स्पष्ट करते हैं कि’ इन्क़लाब ज़िन्दाबाद क्या है ? ’ श्री सम्पादक जी,                                                                                                            मार्डन रिव्यू
आपने अपने सम्मानित पत्र के दिसम्बर, 1929 के अँक में एक टिप्पणी ’ इन्क़लाब ज़िन्दाबाद ’ शीर्षक से लिखी है और इस नारे को निरर्थक ठहराने की चेष्टा की है । आप सरीखे परिपक्व विचारक तथा अनुभवी और यशश्वी सम्पादक की रचना  में  दोष  निकालना  तथा  उसका  प्रतिवाद  करना, जिसे  प्रत्येक भारतीय सम्मान की दृष्टि से देखता है, हमारे  लिये  एक  बड़ी  घृष्टता  होगी । तो भी इस प्रश्न का उत्तर देना हम अपना कर्तव्य समझते हैं कि इस नारे से हमारा क्या अभिप्राय है । यह आवश्यक है, क्योंकि  इस  देश  में इस  समय  इस  नारे  को  सब लोगों  तक  पहुँचाने  का  कार्य  हमारे हिस्से में अया है । इस नारे की रचना हमने नहीं की है । यही नारा रूस के क्राँतिकारी आँदोलन में प्रयोग किया गया था है । प्रसिद्ध समाजवादी लेखक अप्टन सिक्लेयर ने अपने उपन्यासों ’ बोस्टन ’ और ’ आईल ’ में यही नारा कुछ अराजकतावादी क्रान्तिकारी पात्रों के मुख से प्रयोग कराया है । इसका अर्थ क्या है ? इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि सशस्त्र सँघर्ष सदैव जारी रहे और कोई भी व्यवस्था अल्प समय के लिये भी स्थायी न रह सके, दूसरे शब्दों में- देश  और समाज में अराजकता फैली रहे । दीर्घकाल से प्रयोग में आने के कारण इस नारे को एक ऎसी विशेष भावना प्राप्त हो चुकी है, जो सँभव है कि भाषा के नियमों  एवँ  कोष  के  आधार  पर  इसके  शब्दों  से  उचित  तर्कसम्मत  रूप  से  सिद्ध  न  हो  पाये, परन्तु   इसके  साथ  ही  इस  नारे  से  उन  विचारों को पृथक नहीं किया जा  सकता, जो  इसके साथ जुड़े हुये हैं । ऎसे समस्त नारे एक ऎसे स्वीकृत अर्थ के द्योतक हैं, जो  एक  सीमा  तक  उनमें  उत्पन्न  हो  गये  हैं तथा एक सीमा तक उसमें निहित है । उदाहरण के लिये हम यतीन्द्रनाथ ज़िन्दाबाद का नारा लगाते हैं । इससे हमारा तात्पर्य यह होता है कि उनके  जीवन  के  महान  आदर्शों  तथा  उस  अथक  उत्साह  को  सदा सदा  के  लिये   बनायें  रखें, जिसने  इन महानतम  बलिदानी को उस  आदर्श के  लिये  अकथनीय कष्ट झेलने एवँ असीम बलिदान करने की प्रेरणा  दी । यह नारा लगाने से हमारी यह लालसा प्रकट होती है कि हम भी अपने आदर्शों के लिये ऎसे ही अचूक उत्साह को अपनायें । यही वह भावना है, जिसकी हम प्रशँसा करते हैं । इसी  प्रकार ’ इन्क़लाब ’ शब्द का अर्थ भी कोरे शाब्दिक रूप में नहीं लगाना चाहिये । इस  शब्द  का उचित  एवँ  अनुचित  प्रयोग करने  वालों  के  हितों  के  आधार  पर  इसके  साथ  विभिन्न  अर्थ  एवँ  विभिन्न  विशेषतायें  जोड़ी  जाती  हैं । क्रान्तिकारियों की दृष्टि में यह एक पवित्र वाक्य है । हमने इस बात को ट्रिब्यूनल के सम्मुख अपने वक्तव्य में स्पष्ट करने का प्रयास किया था । इस वक्तव्य में हमने कहा था कि क्राँति ( इन्क़लाब ) का अर्थ अनिवार्य रूप से सशस्त्र  आन्दोलन  नहीं  होता । बम और पिस्तौल कभी कभी क्राँति को सफल बनाने के साधन हो सकते हैं । इसमें भी सन्देह नहीं है कि  कुछ  आन्दोलनों  में  बम  एवँ  पिस्तौल  एक महत्वपूर्ण  साधन  सिद्ध होते हैं, परन्तु  केवल  इसी  कारण  से बम और पिस्तौल क्राँति के पर्यायवाची नहीं हो जाते ।  विद्रोह  को  क्राँति  नहीं  कहा  जा  सकता, यद्यपि हो सकता है कि विद्रोह का अन्तिम परिणाम क्रान्ति हो । एक  वाक्य  में  क्रान्ति  शब्द  का  अर्थ  ’ प्रगति के लिये परिवर्तन की भावना एवँ आकाँक्षा ’ है । लोग साधारणतया जीवन की परम्परागत दशाओं के साथ चिपक जाते हैं और परिवर्तन के विचार से ही काँपने लगते हैं । यही एक अकर्मण्यता की भावना है, जिसके  स्थान  पर  क्रान्तिकारी  भावना  जागृत करने  की आवश्यकता है । दूसरे  शब्दों  में  कहा जा  सकता  है  कि  अकर्मण्यता का  वातावरण  निर्मित  हो  जाता  है और रूढ़ीवादी शक्तियाँ मानव समाज को कुमार्ग पर ले जाती हैं । यही परिस्थितियाँ मानव समाज की उन्नति में गतिरोध का कारण बन जाती हैं । क्रान्ति की इस  भावना  से  मनुष्य  जाति  की  आत्मा  स्थायी  रूप  पर  ओतप्रोत  रहनी  चाहिये, जिससे कि रूढ़ीवादी शक्तियाँ मानव समाज की प्रगति की दौड़ में बाधा डालने के लिये सँगठित न हो सकें । यह आवश्यक  है  कि  पुरानी  व्यवस्था  सदैव  न  रहे  और  वह  नयी  व्यवस्था  के  लिये  स्थान  रिक्त  करती  रहे, जिससे कि एक आदर्श व्यवस्था सँसार को बिगड़ने से रोक सके । यह है हमारा अभिप्राय जिसको हृदय में रख कर हम ’ इन्क़लाब ज़िन्दाबाद ’ का नारा ऊँचा करते हैं । 22, दिसम्बर, 1929                                                                                         भगत सिंह - बी. के. दत्त पत्र का मूलपाठ आभार - भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज़ / प्रथम सँस्करण 1986 / सँकलन सँपादन – जगमोहनसिंह  & चमनलाल / राजकमल प्रकाशन अँतर्जाल सँदर्भ : 1. On the slogan of 'Long Live Revolution'                         2.Bhagat Singh Study                                 3.sepiamutiny.com                         4.wikibrowser.net/dt/hi/भगत सिंह चलते चलते : इतिहास से कुछ छवियाँ  
    समँदर की लहरें, सुनहरी रेत, श्रद्धानत तीर्थयात्री रामेश्वरम द्वीप कि वह छोटी-पूरी दुनिया सबमें तू निहित सबमें तू समाहित अधिकाँश पाठक इस वैज्ञानिक के परिचय  को  लेकर  उत्सुक  हो  उठे  होंगे ।  शायद  इनकी  इस कविता  के  इतने  अँश से ही आप इनका अँदाज़ा भी लगा चुके हों । मेरा इन दिनों डाक्टर अब्दुल जल्लालुद्दीन कलाम की विंग्स आफ़ फ़ायर का पुनर्वलोकन चल रहा है । पर इस बार पढ़ने में मैं मैं कई कई जगह ठहरने को बाध्य हुआ । यदि  अपनी  बात  कहूँ  तो, एक  डाक्टर  के नाते जीवन के तत्व को लेकर मेरे विचार उन अपार विद्युत-चुम्बकीय ऊर्ज़ाओं तक जाकर ठहर जाती है, जो  कि  इस  शरीर  के  हर  क्रियाकलाप, यहाँ तक कि सभी जैविक भावनाओं तक को सँचालित करती है और इ्सी बिन्दु पर आकर मेरी विज्ञान का विद्यार्थी होने की विशिष्टता लड़खड़ा जाती है । यह सच ही है, अब  तक  हम  इस  अथाह  समुद्र  के  तट  तक  ही पहुँच पाये हैं, जिसको  विज्ञान  कहा  जाता  है । पर, वस्तुनिष्ठता  की  आड़  में  इसकी  तलहटी  तक  का  भेद  जान  लेने  के मिथ्याभिमान से व्यामोहित हैं । आज डाक्टर कलाम की इस आत्मकथात्मक प्रस्तुति को दुबारा पढ़ते समय मैं कई कई जगह ठहर गया, भला ऎसा क्यों ? यह तो आप स्वयँ ही पढ़ कर देखिये.. ..
जब मैं सेंट ज़ोसेफ़ कालेज के अँतिम वर्ष में था तभी मुझे अँग्रेज़ी साहित्य पढ़ने का चस्का लग गया । मैंने टाल्स्टॉय, स्काट और हार्डी को पढ़ना शुरु किया । उसके बाद दर्शन की ओर झुकाव हुआ तथा उस पर काम भी किया । यह वह समय था जब मेरी भौतिकी में गहरी रुचि हो गयी थी । सेंट ज़ोसेफ़ के मेरे भौतिकी के शिक्षकों प्रो. चिन्ना  दुरै  और  प्रो. कृष्णमूर्ति  ने  मुझे परमाणवीय भौतिकी के अध्यायों में मुझे पदार्थों के अर्धजीवनकाल की अवधारणा और उनके रेडियो-एक्टिव क्षय के बारे में ज्ञान कराया । रामेश्वरम में मेरे विज्ञान के शिक्षक  शिवसुब्रह्मण्यम अय्यर ने मुझे कभी यह नहीं बताया था कि परमाणू अस्थिर होते हैं और एक निश्चित समय के बाद दूसरे परमाणू में परिवर्तित हो जाते हैं । यह सब मैं पहली बार ही जान रहा था ।                                             लेकिन जब उन्होंने मुझे हर पल कड़ा परिश्रम करने की बात कही,  क्योंकि   यौगिक  पदार्थों   का  क्षय  अपरिहार्य  है, तो  मुझे  लगा  कि  क्या  वे  एक  ही तथ्य के बारे में बात नहीं कर रहे थे । मुझे आश्चर्य हुआ कि कुछ लोग विज्ञान को इस तरह से क्यों देखते हैं, जो व्यक्ति को ईश्वर से दूर ले जाये । जैसा कि मैंनें इसमें देखा कि केवल हृदय के माध्यम से ही हमेशा विज्ञान तक पहुँचा जा सकता है । मेरे लिये विज्ञान हमेशा आध्यात्मिक रूप से समृद्ध होने और आत्मज्ञान का रास्ता रहा । मैं ब्रह्मांड के बारे में खूब उत्सुकता से किताबें पढ़ा करता हूँ तथा खगोलीय पिंडो के बारे में अधिक-से-अधिक जानने में मुझे बहुत आनन्द आता है । कई मित्र मुझसे अँतरिक्ष उड़ानों से सँबन्धित बातें पूछ  लेते हैं और कई बार चर्चा ज्योतिष में चली जाती है । ईमानदारी से मैं वाकई अभी तक इस बात का कारण नहीं समझ पाया हूँ कि क्यों लोग ऎसा मानते हैं कि हमारे सौर परिवार के दूरस्थ ग्रहों का जीवन के रोजमर्रा की घटनाओं पर प्रभाव पड़ता है । एक कला के रूप में मैं ज्योतिष के ख़िलाफ़ नहीं हूँ । लेकिन अगर विज्ञान की आड़ में इसे गलत तरीके स्वीकार किया जाता है तो मैं इसे नहीं मानता । मूझे नहीं पता कि ग्रहों, नक्षत्रों, तारामँडलों और यहाँ तक कि उपग्रहों के बारे में इन मिथकों ने जन्म कैसे लिया । ब्रह्माँडीय पिंडों की अत्यधिक क्षुद्र गति की जटिल गणनाओं में हेरफेर करके यदि व्यक्तिपरक नतीज़े निकाले जायें तो वे मुझे अतार्किक लगते हैं । जैसा मैं देखता हूँ कि पृथ्वी ही सबसे अधिक सक्रिय, शक्तिशाली  और  ऊर्ज़ावान  ग्रह है । जान मिल्टन ने इसे ’ पैराडाइज़ लॉस्ट’ पुस्तक VIII ’ में बड़ी ही खूबसूरती से व्यक्त किया है - ’ होने दो सूर्य को दुनिया का केन्द्र और सितारों की धुरी । मेरी यह धरती कितनी गरिमामय घूमें धीमे-धीमे तीन अलग धुरियों पर ।’ इस ग्रह पर आप जहाँ भी जाते हैं वहाँ गति और जीवन है, वैसे ही निर्जीव वस्तुओं जैसे चट्टानों, धातुओं, लकड़ी, चिकनी मिट्टी में भी आँतरिक गतिशीलता विद्यमान है । हर नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रान चक्कर काट रहे हैं । नाभिक इन इलेक्ट्रान को अपने चारों ओर बाँधे रखता ह ।  इसी की प्रतिक्रिया में इलेक्ट्रान उसके चारों ओर घूमते रहते हैं और यही इनकी गति का स्रोत है । इलेक्ट्रान को बाँधे रखने वाले इसी यही विद्युत-बल इन्हें ज्यादा से ज्यादा करीब लाने भी कोशिश करते हैं । इलेक्ट्रान एक निश्चित ऊर्ज़ा वाले उस पृथक कण के रूप में है जो नाभिक से बँधा हुआ है । इलेक्ट्रानों पर नाभिक की पकड़ जितनी मज़बूत होगी, अपनी कक्षा में इलेक्ट्रानों की गति ही उतनी तीव्र होगी । वास्तव में यह गति एक हज़ार किलोमीटर प्रति सेकेन्ड तक की होती है । उस अत्यधिक वेग के कारण परमाणु एक ठोस गोले की भाँति नज़र आता है; जैसे  तेज  गति  से  घूमने  वाला  पँखा एक थाल की तरह दिखता है । परमाणुं को सँपीडित करना या कहें तो एक दूसरे के और करीब लाना बहुत ही मुश्किल  है  और  यही  किसी  पदार्थ  का  दिखने वाला भौतिक स्वरूप होता है । इस प्रकार हर ठोस वस्तु के भीतर काफ़ी खाली स्थान होता है और हर स्थिर वस्तु के भीतर काफ़ी हलचल होती रहती है । यह ठीक उसी तरह है जैसे हमारे जीवन के हर क्षण में भगवान शिव का शाश्वत नृत्य हो रहा होता है । प्रो. ए. पी. जे. कलाम के आत्मकथ्य ’ विंग्स आफ़ फ़ायर ’ से अँग्रेज़ी से अनूदित पृष्ठ सँ. 35-36 का अँश " शारीरिक जीवन के इस कैदखाने में आने से पहले हम कहाँ थे और क्या थे ? " " ये समझदार, सँज्ञाशील और शरीर में  बेचैन रहने वाली आत्मायें हमारे शरीर में आने से पहले कहाँ थीं और क्या थीं ? इससे पहले कि ज़माना हमें निरर्थक आवाज़ बना कर दुनिया में लाया, हम किस सँतोष की साँस ले रहे थे ? " " हमारे प्राण इन स्वरूपों में बदलने से पहले किस स्थिति में थे ? " " सपनों की दुनिया में बोलती हुई यह जागृति, विचारों से सजा यह चिंतन, यह आनन्द और दुःख, प्रेम और घृणा से बँधी हुई अभिलाषायें माताओं के पेट में ही पैदा हुई या आकाश के वायुमँडल में ? " "क्या इससे पहले की आकाँक्षा हमें जीवन की गोद में ले आई, हम कुछ भी न थे ? " होश सँभालते ही मैंने यह सवाल अपनी आत्मा से पूछे । मेरी आत्मा ने इन सवालों के ज़वाब कुछ ऎसे सँदिग्ध वाक्यों में दिये, जो मेरी समझ से परे थे । मेरा चिन्तन उन वाक्यों को एक गहरी ख़ामोशी की तरफ़ ले गया, जिस तरफ़ बरफ़ के टुकड़े पानी में गिर कर पानी हो जाते हैं । कल  एक  नयी  घटना  मेरे  सामने  आई, जो  अदृश्य जगत के भेद मुझ पर खोल देती है । यह घटना मेरे कल्पनालोक को उस ज़माने के पास ले गयी जब मेरा वाह्य शरीर प्रकट नहीं हुआ था । मैंने एक आदमी को  देखा, जो  अपनी आत्मा के सँबन्ध में कुछ बता रहा था । उसके शब्दों ने मुझ पर ऎसा ज़ादू कर दिया कि मेरे सीमित चिंतन और अल्पबुद्धि का वह बारीक रिश्ता और मज़बूत होने लग पड़ा ।  इस अँश का अँग्रेज़ी से अनुवाद : डा. अमर कुमार अब ब्लागर पर प्रकाशित ज़िब्रान की एक लघुकथा –उसने पुरुष से कहा, ''मैं तुम्हें प्रेम करती हूँ।'' पुरुष ने कहा, ''मैं भी तुम्हारा प्रेम पाने को लालायित रहा हूं।'' स्त्री ने कहा, ''लगता है तुम मुझे नहीं चाहते।'' सुनकर आदमी ने ध्यान से उसकी ओर देखा, पर कहा कुछ भी नहीं। इस पर वह औरत चीख पड़ी, ''मुझे तुमसे नफरत है।'' पुरुष ने कहा, ''मेरी दिली इच्छा है कि किसी तरह तुम्हारी नफरत ही पा सकूँ।'' कथाकार / सुकेश साहनी / ब्लागपोस्ट 16 मई 2008 / खलील ज़िब्रान:जीवन और लघुकथायें जब कौल कर ही लिया है, तो मैं आज कुछ न लिखूँगा.. तो आप भी कुछ न पढ़ना । आपकोब्लागवाणी पर यह ज़ब्बर टाइप शीर्षक दिखला कर यूँ ही फुसला कर बुला लूँ, और यहाँ एक वाह-वाह आलेख पकड़ा दूँ... यह  हमसे  न होगा ! अपने  मुँह मियाँ  मिट्ठू... वाः वाः कौन कहता है, कि  आपने  कभी  कोई  वाह-वाह पोस्ट भी लिखी है ? किसीके यह पूछने से पहले ही, यह बता देता हूँ कि, भाई इब मन्नैं भी एक गुट बना लिया है । आठ-दस फोन नम्बर भी बटोर लिया है । चाहोगे तो अपने पोस्ट किये जाने वाली टिप्पणी का डिक्टेशन भी दे दूँगा, मुफ़्त.. मुफ़्त.. मुफ़्त.. ! भले आप दरिया किनारे जाकर मुर्गी के अँडे छील कर उबाल लो, उस  उबले  अँडे का आमलेट तक हम्मैं निगलवा दो... लेकिन यह जान लो कि मेरी तो आठ-दस रेडीमेड वाह-वाह टिप्पणी  पक्की  ही  है । हमरा एक निर्गुट कबीर गैंग जो है । इसके सभी निर्गुणिया सदस्य , अपने  लोगों  के  लिये  वाह-वाह  हरमुनिया बजाने में निष्ठावान गुणी हैं । मैं अँट-शँट नहीं बक रहा भाई.. और  न  ही  मेरे  पास  इस  पोस्ट  को लँबा खींचने की फ़ुरसतिया-पावर है । डारविन के रिश्ते से स्वाइन जी कभी तो हमारे पितर रहे होंगे.. पितर  का कर्ज़ उतारने का मौका अच्छा रहा । सो, स्वाइन महाराज के तर्पण को एक पोस्ट लिखने बैठा, और फुस्स हो गया । बड़े लोचे हैं, इस स्टोरी में…. दायें  हाथ  मौत  बाँटी  जाती  है और  बायें  हाथ सँजीवनी  बेची  जाती है ।चुनार के किले का तिलिस्म फेल.. नौगढ़  एवं  विजयगढ़  के  राजाओं  को ज़ालिम  क्रूर सिंह महाजन  के  आगे  पानी  भरते  देख  मेरा रहा-सहा  दिमाग  भी बौरा  गया । जरा मीडिया  की  कबूतरबाज़ी   थमे, तब्भी  मेरा  पोस्ट  चलेगा ! अक्खा यह अपुन का इंडिया है, जहाँ सभी उड़ाते चिड़िया हैं । धात्त.. मैंने तो कहा था कि, आज कुछ भी आँय बाँय शाँय नहीं लिखूँगा,..आई एम सॉरी भाई । आज  ब्लागिंग  के  मद  में डेढ़  घँटे एलाट हुआ था । मैंनें  पहले ही कहा  था  न  कि, आज  कुछ  न लिखूँगा !   सो  लगे  हाथ  इसी  में  टाइम  खोटी  कर  लिया । परीक्षा  की  उत्तर-पुस्तिकाओं  पर  ऎसे टाइमपास  का अभ्यास  तो  बहुत  पहले ही  कर  लिया था । अब काम आ रहा है । आई एम सॉरी भाई ! हुआ यह कि एक दिन जया की शैतानियों पर मुझे प्यार आ गया, " देखो तो छटँकी कैसी हरकतें कर रही है ? " निखिल को मौज़ आ गयी, " छटँकी क्यों कहा, अँकल ?"  मैं उनको इस विषय पर शह नहीं देना चाहता था, सो टाल गया, " देखो फ़िफ़्थ में पहुँच गयी, और अभी भी इत्ती सी है !" लेकिन आज उसका जैसे दिन ही ख़राब था । जिसको कि तुम बच्चा-पार्टी  कहते हो कि, " आज तो मेरा लक ही ख़राब है । " मैंने चिढ़ाया !  यह सुनते ही परम विद्वान, महाज्ञानी चुगलखोर महाराज श्री वैभव जी तुरँत लपक पड़े, " औः और.. और क्या, ठीक तो कहते हैं, अचपन जी । लक वक कुच्छ नहीं होता है । मम्मी दूध का गिलास लिये इसके पीछे पीछॆ घूमती रहती हैं, तब जाकर यह दूध पीती है । औः औह... उसमें से भी इत्ता सारा दूध मेरे गिलास में डाल देती है । " मैंनें अपना ढेर सारा मुँह लटका कर कहा, " यह गलत बात है, जया । इससे तो तुम इत्ती की इत्ती रह जाओगी । ताकत के किये और बढ़ने के लिये तो यह सब ज़रूरी है, न भाई ? " अब तो वैभव गुरु जैसे  मेरे सेनापति बन गये, " मेरी कुर्सी के हत्थे पर सवार होकर मेरा मुँह अपनी ओर ज़बरन खींच खींच और सारे भेद उगलने लगे, " अचपन जी.. अचपन जी.. ऎई अचपन जी सुनिये तो... यह, यह  ग्रीन वाली सब्ज़ियाँ.. अरे, वो हरी वेजिटेबुल, हाँ यह तो वह भी नहीं खाती है, जो  एक  बार  आपने हम सब को विडियो दिखला कर बताया था ! एप्पल भी नहीं ! " कहती है कि, कम्पलान तो पीती हूँ । मैंनें उछलने का एक्सन किया, “ भाई कम्पलान तो बहुत बड़ा धोखा है । उससे कुछ भी ख़ास नहीं होता । निखिल ने कहा, जो बात आप जानते हैं, वह सरकार भी तो जानती होगी, फिर बिकता क्यों है ? मैं उनको समझाने के लिये कुछ अच्छा सोच ही रहा था कि, वैभव जी का धैर्य चुक गया । अचपन  जी, जया ने तो कल  सारा  पालक  छिपा  कर  गमले  में  फेंक  दिया  था ।  और  और  औः मुझको मारने का प्लान बना रही थी ।  बड़ी मुसीबत है, भाई .. अगर अभी जया को डाँट पिलाता हूँ, तो  इन  श्रीमान  चुगलखोर  जी  का  हौसला  बढ़ता  है । और कुछ न कहता हूँ तो जया का नुकसान हो सकता है । किसी दूसरी तरह से इन बच्चों को यह सब समझाना पड़ेगा । एकदम से एक बात सूझी, मैंने कहा ठीक है.. तुम लोग जो मन हो करो,मेरा क्या ? तुम  खुद  ही  पिंगपिंग जैसी हो जाओगी, अगर चाहो तो पैन्क्रातोवा जैसी भी बन सकती हो । निखिल महाशय अकेले ही गेंद को टप्पा खिलाने में मस्त थे, एकदम से गेंद छोड़ छाड़ कर दौड़े हुये आये, " कौन है यह पिंगपिंग.. अँकल ? और वो अभी जो एक नाम और भी ले रहे थे.. तोवा-कोवा जैसा कुछ करके, वह कौन है ? "  बता  दूँगा.. बाद में बता दूँगा । उनका ज़वाब तैयार था, " क्यों.. बाद में क्यों ? आप भूल गये तो.. आप  ही  तो  कहते हैं   कि, अपनी जी० के०   बढ़ाने   वाली  जानकारी  लेने  में  देर  नहीं करनी चाहिये.. फिर बाद में क्यों ? " आज बहुत दिनों बाद तुम फिर फँसे, अचपन ! बच्चों की दोस्ती जी का ज़ँज़ाल ! अच्छा तो पहले उस कोने वाली टेबुल से मेरा एल्बम तो उठाओ, और  सबसे  ऊपर  के  तीन पन्नों  पर लगे फोटो  देखो !  यह  फोटो  अभी  पिछले  ही वर्ष तो, यानि 16 सितम्बर 2008 को लँदन में खींचे गये थे ।  इतने देर बार जाकर जया जी का बोल फूटा, "अरे… ये कौन  हैं,  इनके फोटो क्यों खींचे गये,  अँकल ? " पिंगपिंग मँगोलिया में रहते हैं और दुनिया में सबसे कम लम्बाई के आदमी हैं । यह  सिर्फ़ 2 फ़ीट 5 इंच के हैं । निखिल  बीच  में  बोले,"  मुझे  सेन्टीमीटर  में बताइये ।" सेन्टीमीटर में 74.61 से. मी. होता है । निखिल  ने  शाम  को  फोन  करके  मुझे  बताया  कि, 74.61 से. मी. 2 फ़ीट 5.37 इंच होता है । खुश हैं कि,  मेरी  एक  गलती  उनके  हाथ  लग  ही  गयी । और यह लड़की दुनिया की सबसे लम्बी टाँगों वाली औरत है । यह  रूस में  रहती  है, और  इसका  नाम है    स्वेतलाना पैनक्रातोवा  । जरा देखो, सिर्फ़ इसके टाँगों की लम्बाई ही पूरे 4 फ़ीट 4 इंच यानि 132  से.मी. है । यह सब देख सुन कर भी बच्चों को सँतोष न हुआ । जया ने मुझे फिर याद दिलाया कि, " मगर यह तो आपने बताया ही नहीं कि, इनकी फोटो क्यों खींचीं गयी है ? " सच्ची, यह तो बताना मैं  भूल ही गया था, " उस दिन 20 सितम्बर 2008 को यह दोनों गिनीज़ बुक आफ़ वर्ल्ड रिकार्ड में अपना नाम दर्ज़ करवाने को लँदन बुलाये  गये  थे  । वैभव क्यों पीछे रहें, " तो तो इनका नाम  वहाँ  नोट  हो  गया ? " हाँ भाई, यह फोटो उसी वक्त की तो है । बच्चों के चेहरे खिल उठे, एक नयी जानकारी उनके हाथ जो लग गयी थी ! लौटते हुये निखिल जी उनको समझा रहे थे, वर्ल्ड रिकार्ड का मतलब विश्व कीर्तिमान.. मतलब उनके टक्कर का कोई नहीं, समझे ? बहुचर्चित शशि हत्याकाण्ड की गूँज कुछ थम सी गयी है ।  पर  मक़तूल  के  रिश्तेदार, कातिल   और पैरोकार तो इसे अपने अपने ढँग से जी ही रहे हैं !  इस  हत्याकाण्ड  के  मुख्य  आरोपी  आनन्द सेन  के साथ अन्य आरोपियों में सीमा आज़ाद भी सह-आरोपी ठहरायी गयी हैं, केस  विचाराधीन  है.. ज़ाहिर है, कानून का पहिया अपनी ही रफ़्तार से घूमेगा । फिलहाल सभी अभियुक्त सलाखों की निगहबानी में हैं । जैसा कि अक्सर होता है, आदमी  ज़ेल  की  तन्हाईयों  में  चिंतक  और  कवि  हो  जाता है । भला सीमा आज़ाद ही अछूती क्यों रहें ? आजकल वह भी कवितायें लिखने लग पड़ी हैं । इस वक़्त सीमा ज़मानत पर ज़ेल से बाहर हैं पर उनकी डायरी जो कि ज़ेल में लिखी जा रही थी, कुछ  ऎसा  व्यक्त  कर  रही  हैं मानों  उन्हें सत्य   की  ज्ञान  प्राप्ति  हो  गयी  हो । जो वह  सत्ता और सत्तानसीनों के सानिध्य में रह कर न देंख पायी होंगी, उनके  ज्ञानचक्षुओं  को  अब  अनायस ही  यह  सब  दिखने  लग  पड़ा  है । एक बानगी है, उनकी  एक  कविता ’ वर्दियाँ ’ की कुछ पँक्तियाँ.. सच्चाई का सबूत मिटाती हैं वर्दियाँ, किस तरह गुनहगार बनाती है वर्दियाँ इनसे कोई भी बात बताना फ़िज़ूल है सच को सच न कहो यही इनका उसूल है किस तरह सरे-आम सताती हैं वर्दियाँ इनका कोई भी न धर्म है न ही कर्म है कोई, इनको किसी का डर है न ही शर्म है कोई अपना ज़मीर भी बेच खाती हैं,वर्दियाँ आगे और भी है.. क़ातिल को घुमाती हैं सरे-आम सड़क पर, देती हैं खुले आम कातिलों का साथ ये सुनती नहीं लाचार ग़रीबों की सिसकियाँ हादसा होता नहीं इनके सलाह बिन पहुँचेंगे देर से ही ये हो रात चाहे दिन दामन को अपने साफ बताती हैं वर्दियाँ कविता स्रोत : नाम अज्ञात रखने की शर्त पर एक प्रेसकर्मी मित्र के सौजन्य से सम्पूर्ण पोस्टिंग उत्तरदायित्व : डा. अमर कुमार इस पहेली को हल करने के प्रयास में मुझे एक घटना याद आ गयी, दो दोस्त आपस में उलझे हुये थे, शायद उन्हें कुछ लगी हुई थी । पहले ने कहा, " अगर मैं चाहूँ तो, तुम्हारे ऊपर पेशाब भी कर दूँ और तू भीगेगा भी नहीं !" दूसरा उखड़ गया, " भला ऎसा कैसे हो सकता है ?" हो सकता है.. नहीं हो सकता है कि तू तू मैं मैं चलने लगी, दस बीस तमाशबीन इकट्ठे हो गये । पहले ने कहा, " चाहे तो शर्त लगा ले ।" दूसरा भड़क गया, " ऎसी अनहोनी पर शर्त क्यों लगा लूँ ?" अब शर्त लगा ले..  और शर्त क्यों लगा लूँ.. की नोंक-झोंक चलने लगी । किसी ने सुझाया, अरे आज़मा ले भाई , शर्त लगाने में क्या जाता है ? जो हारेगा , आख़िर उसी को पैसा भी तो भरना पड़ेगा कि नहीं ? बीस रूपये की शर्त लग गयी । अगर तू पेशाब में भीग गया तो बीस रूपये तेरे, वरना तुम्हें बीस रूपये देने पड़ेंगे । चल ठीक है, चल ठीक है ! पहला उसे कोने में ले गया, और उसके ऊपर झर झर मूत दिया । दूसरा सिर से पाँव तक तर हो गया । पर, वह खुशी से चीख उठा, " देखो देखो, मैं तो पूरा भीग गया ! " जनता ने देखा, सबने देखा, हर आते जाते ने देखा और उसके पक्ष में खड़ी हो गयी, " भई तू शर्त हार गया है, चल इसे बीस रूपये दे ।" पहले ने कहा, " मैं कब कह रहा हूँ कि, मैं जीत गया ?  यह ले अपने बीस रूपये ! " उपस्थित भीड़ ने मज़ा लिया और चले गये अपने अपने रास्ते । उनकी यारी न टूटी, शाम को दोनों अपनी रोज की तलब ख़ारिज़ करने को इकट्ठे हुये । दूसरे ने पूछा, " यार यह बता कि तुमने यह कैसे सोच लिया कि तेरी हरकत से मैं नहीं भीगूँगा ।" पहले ने शाँति से ज़वाब दिया, " मैं जानता था कि तुम क्या कोई भी भीग जायेगा ।" दूसरा चौंका, " फिर ? " पहले ने कहा, " यार यह बता कि तुमको ताव दिलाया और इतना मज़मा इकट्ठा हो गया, और तू भी सराबोर हो गया कि नहीं ? " दूसरा हँसा, " इससे तुम्हें क्या फायदा हुआ ।" पहले ने कहा कि, " फायदा नुकसान मैं नहीं जानता ।  तू यह बता कि बीस रूपये में यह डील क्या बुरी रही ? "  मैं जानता हूँ, भाई कि इस पोस्ट से लम्बी यह  टिप्पणी सार्थक  नहीं है, और यहाँ माडरेशन भी लगा है । फिर भी, इस साझा मँच पर एक  पाठक के नाते अपनी निरर्थक बात  भी कहने का अधिकार तो है, ही ! अब इस पहेली का हल सोचता हूँ । उत्तर सही लगेगा, तो टिप्पणी बक्से का दुबारा उपयोग करूँगा । आपकी टैगलाइन" इस ब्लॉग पर लिखी बातों का मेरी विचारधारा से मेल खाना आवश्यक नहीं है,यहाँ लिखी बातें विभिन्न दृष्टिकोणों से सोचने का परिणाम हैं . अत: किसी प्रकार का पूर्वाग्रह न रखें ! "से बल मिला सो साहसपूर्ण यह टिप्पणी चेंप रहा हूँ । सबसे पहले -  श्री राजशेखर रेड्डी हमारे बीच न रहे । यहाँ कोई भी शरीर स्थायी परमिट लेकर नहीं आता है, तो उसके न रहने का शोक क्यों ? जिस तरह से उनको विदा होना पड़ा, वह वाकई दुःखद है । किसी भी राजनैतिक पार्टी के पर्ति कोई विशेष प्रतिबद्धता न रखते हुये भी मैं उनका प्रशँसक रहा । उनकी डाउन टू अर्थ कार्यशैली मुझे यदा कदा अचँभित तो करती ही थी, साथ  ही वह मेरे दूर के मौसेरे भाई भी थे { डाक्टरों के प्रति लोग जैसी छवि बनाते जा रहे हैं, उसे देख उनके चिकित्सा स्नातक होने के नाते मैंनें स्वतः ही उनसे ऎसा रिश्ता जोड़ लिया था } परमपिता उनको सदगति प्रदान करे । इस दुःख को हमारे इलेक्ट्रोनिक मीडिया के व्यवहार ने और भी गाढ़ा कर दिया । चैनलों पर कल रात्रि से लगातार चल रही  उत्तेजना , और  एक एक्साइटमेन्ट ? का अँत हुआ । कमसिन बालायें जैसे भाड़े पर आँखें घुमाने और हाथ नचाने से मुक्ति पा गयीं ।  वह मिलेंगे.. वह नहीं मिलेंगे.. वह ज़िन्दा हैं.. वह घायल और अचेत हैं.. वह ज़ँगल के नज़ारे देखने को कहीं रुक गये हैं... या  वह  नक्सलियों  के हाथों  में  हैं .. जैसे तमाम  सवालात  उनको  परेशान  जो  करते रहे  । उनके अवसान की पहली ख़बर कौन परोसे, यह उतावलापन स्पष्ट दिख रहा था !  आजतक वाले तो, अगला मुख्यमँत्री कौन, की मुहिम में लग पड़े सर्वप्रथम रहने की दौ्ड़ इस हद तक तक़लीफ़देह है, कि एक साहब नें वाईकेपिडीया पर सायँ 6.30 या 7.00 बजे ही उनकी मृत्यु  दर्ज़ कर डाली ( मैंने यह रात्रि में 9.45 के आसपास ही देखा ) पिछली पोस्ट पर, अभिषेक ओझा की टिप्पणी ने जैसे एक ट्रिगर-इफ़ेक्ट  कर दिया हो क्योंकि मुझे यह धुँधला सा याद था कि, बुनो  कहानी  पर  जीतेन्द्र चौधरी  ने  मीडिया  के  ऎसे  प्रहसन  को ’ कवर स्टोरी : घासीराम की भैंस ’ में  बड़े  अनोखे  अँदाज़  में  चित्रित  किया  था ।  जिसे  तत्कालीन  फ़ुरसतिया ’अनूप  शुक्ल ’ने अपने गाँव ढक्कनपुरवा से एक दूधिये की भैंस भाग जाने पर एक चलताऊ चैनल चर्चा  पर दो दिन पहले ही ब्लागित किया  था  और  इसके  कारक  बने  । इसी विषय की कड़ी को डा  पद्मनाभ मिश्र ’ आदि यायावर ’ ने फुल्ली फालतू चैनल का कवर स्टोरी: घासी राम की भैँस पर और भी आगे बढ़ाया । वह अब सक्रिय न सही, पर नेट पर तो मौज़ूद ही हैं । तो.. लीजिये, पढ़िये फुल्ली फालतू चैनल का कवर स्टोरी : घासी राम की भैँस  पिछले अँक मे आपने पढा: यहाँ क्लिक कीजिए. घासी राम की भैँस ढक्कनपुरवा गांव से उस समय रस्सी तोडकर तबेले से भाग गयी जब घासी राम अपने दोस्त कल्लू के शवयात्रा मे गया था. टी.आर.पी. महिमा के लिए इसको फ़ुल्ली फ़ालतू नामक एक टी.वी. चैनल पर कवर स्टोरी बना कर दिखाया जा रहा था. चैनल के मालिक गुल्लु को इस खबर से बहुत ज्यादा टी.आर.पी. और एस.एम.एस से बहुत पैसा जोगाड़्ने की उम्मीद थी. कातिल अदाँए वाली निधि खोजी, ओवरटाइम का पैसा नही माँगने वाला टप्पू सँवाददाता और समाचार वाचिका रुपाली अभी-अभी हुए ब्रेक के बाद लौटी हैँ. सुन्दरी  नामक  भैँस  को कवर  स्टोरी  बनाने  के  लिए  उसको  तालाब  मे  तैराकी  का  प्रैक्टिस  छोडवाकर  फुल्ली-फालतू  चैनल  के स्टूडियो मे रखा गया है. अब आगे पढिए... ब्रेक के बाद चैनल स्टूडियो मे कुछ नए लोग आते हैँ. टप्पू ने अपने विश्वस्त सूत्रो से पहले ही पक्का कर लिया था कि स्टूडियो मे घासी-राम के भैँस की कहानी पर अपना राय देने वाले सारे लोग अपने अपने क्षेत्र के एक्स्पर्ट है जिनका वर्णन निम्न्लिखित हैँ. जोखन डाक्टर: जोखन डाक्टर ग्यारह साल पहले १३ लाख मे एम.बी.बी.एस. की डीग्री पढ कर आए थे. शुरु के आठ साल तो चूँगी पर बैठ कर आदमी का डाक्टर बने रहे. आदमी का डाक्टरी तो चली नही गलत दवा देने से पाँच लोगो के मौत का मुकदमा हो गया. तब से अकल ठीकाने आई और फिलहाल पिछले तीन साल से जानवर का डाक्टर बने पडे हैँ. बुजूर्गोँ ने समझाया इसमे रिस्क नही है. सेवकराम साइको: पहले इनका नाम था सेवकराम शर्मा. पिछले बीस साल से साइकेट्रिक डाक्टर हैँ और अपना बिजिनेस बढाने के लिए अपने नाम के आगे साइको लगाया है. गल्लू से पहुत पहले इनका करार हुआ था. इनको टी.वी. पर लाइव दिखाने पर सेवकराम साइको गल्लू को १० हजार रुपैया देगा. कालू प्रसाद "देशप्रेमी": आजकल के सत्तारुढ पार्टी का एम.एल.ए और अपने पार्टी का प्रवक्ता. जब से पिछली सरकार ने इनके उपर लगा बलात्कार का आरोप सी.बी.आई से जाँच करने को कहा ये अपने नाम के आगे देशप्रेमी जोड लिया. अभी  तो  सत्तारुढ़  पार्टी  मे  हैँ लेकिन विपक्ष कहती है कि लोगों का अटेन्सन दूर करने के लिए अपना नाम के आगे देशप्रेमी लगाए हैँ. टी.वी.स्क्रीन पर फुल्ली फालतू चैनल फिर से आता है. रुपाली अपने बालोँ की लटो को एक बार फिर से झटकती है और और बोलने लगती है. रुपाली:  दर्शकोँ हम फिर से हाजिर हैँ घासीराम के सुन्दरी का एक्सक्लूसिव रिपोर्ट लेकर. जैसा कि पहले बताया जा चुका है,  हम  दूनिया  मे  पहली  बार  इस  खबर  को प्रसारित कर रहे हैँ कि आखिर घासीराम की सुनदरी भैँस रस्सी तोडकर गयी किधर. जो लोग अभी-अभी टी.वी आन किए है उनके लिए मै बता दूँ कि आज सुबह सुबह ढकनपुरबा गाँव के श्री घासीराम जी जी सुन्दरी नाम की भैँस रस्सी तोडकर भग गई है. हम अपने इस चैनल पर एक्स्क्लूसिवली रिपोर्ट दिखा रहे हैँ कि आखिर सुन्दरी को वह कौन सा बात खराब लग गई जिससे वह घर छोडकर चली गई. क्या उसका किसी से चक्कर था ? या वह  किसी  मानसिक  प्रताडना  का  शिकार  थी. घासीराम  के बातोँ से तो यह नही लगता है कि उसने सुन्दरी को भगाया है. आज इसी बात पर चर्चा करने के लिए हमने कुछ एक्स्पर्ट को बुलाया है. आज हमारे साथ मौजूद हैँ, एक जाने माने पशु चिकित्सक श्री जोखन डाक्टर, प्रसिद्ध मनोवैग्यानिक श्री सेवक साइको, और ढकनपुरवा गाँव के स्थानीय विधायक श्री कालू प्रसाद "देशप्रेमी". और हमारे सँवाददाता निधि खोजी मौजूद हैँ घटनास्थल पर. हम समय समय पर दर्शको का राय भी लेते रहेँगे. आप अपना राय टाइप करके हमे भेजेँ. हमारा नम्बर है ४५४७६. तो हम बिना समय गँवाए सीधे मुद्दे पर आते हैँ और पहला सवाल करते हैँ हमारे आज के एक्स्पर्ट सेवकराम साइको जी से. रुपाली: सेवकराम जी हमारे स्टूडियो मे आपका स्वागत है. आप तो पिछले बीस साल से मनोवैग्यानिक रहे हैँ. आपको क्या लगता है. सुन्दरी की मान्सिक स्थिति कैसी रही होगी. वह घासीराम का घर छोडकर क्योँ भाग गयी. सेवकराम साइको: रुपाली' जी मुझे अपने स्टूडियो मे बुलाने के लिए धन्यावाद. मुझे तो सुन्दरी का केस पुरा साइकोलोजिकल लगता है. और लगता है कि वह "साइक्लोजिकल डिसओर्डर सिन्ड्रोम" से ग्रसित है. इस तरह के बीमारी मे भैँस क्या आदमी भी अपना घर छोडकर चला जाता है और भी बिना कुछ बताए. अभी हाल मे ही एक औरत अपने पति को छोडकर अपने प्रेमी के साथ भाग गई थी और उसको जाँच करने के बाद पता चला कि वह भी इसी सिन्ड्रोम से ग्रसित थी.  कालूप्रसाद देशप्रेमी: (  इन सभी का बात काटते हुए बीच मे ही बोल उठा.) रुपाली जी, इसमे मुझे किसी बिमारी का कोई बात नही लगता है. यह तो विपक्षी पार्टी का काम है. घासीराम के भैँस को भगाकर उसमे अल्पसँख्यक वर्ग का नाम बिगाडने की साजिस है. हम यह काम नही होने देँगे. हमारी सेकुलर पार्टी देश मे इस तरह के कम्यूनल पार्टी का पर्दा फास करेँगे. तभी निधि खोजी का खबर आता है और बीच मे ही रुपाली सबको चुप कराते हुए बोलती है. रुपाली: दर्शकोँ हमारी संवाददाता अभी ढकनपुरबा गाँव मे मौजूद है. निधि क्या आप मेरा आवाज सुन रही हैँ. क्या माहुल है वहाँ का? निधि (अपने कान का टेपा सही करते हुए): जी रुपाली पूरा गाँव सुन्दरी के जाने से गमगीन है. पडोस का भैँसा अभी तक चारा नही खाया है. घासी-राम का रो-रोकर हालत खराब है. लेकिन अभी तक स्पष्ट नही हो पाया है कि रुपाली आखिर भागी क्योँ. रुपाली के आस मे सब लोग रास्ता देख रहे हैँ. लोग बोलते हैँ मेरी रुपाली-मेरी रुपाली... रुपाली: (अचानक घबराकर चौँक जाती है और धीरे से फुसफुसाती है) अरे  निधि  रुपाली  नही  सुन्दरी...सुन्दरी... (और भी धीरे से-- स्टूपिड नोन्सेन्स) निधि (एक ही बार मे स्टूपिड शब्द समझने के बाद फिर से अपने बालोँ को झटकते हुए): जी हाँ रुपाली नही माफ कीजिएगा हम निधि की बात ...ओह सोरी.. घासीराम की भैँस सुन्दरी की बात कर रहे थे. अपने पास खडे हुए यूवक को पूछते हुए. हाँ तो आप मुझे बताएँ कि सुन्दरी क्योँ भागी ? यूवक (कैमरा के बजाए निधि को देखते हुए): वो क्या है मैडम, हम सुबह सुबह मैदान को गए थे. देखो तो उधर से दो भैँस कहीँ जा रहे थे. हमे पक्का विश्वास है कि वह सुन्दरी ही रही होगी. पिछले छओ महीना से उसका पडोस के भैँसे से जबरदस्त चक्कर रहा है. हम तो कई बार समझाए घासी राम को लेकिन उ माने तब ना. जान्बुझ के पडोस के भैसे के सामने मे बान्धता था. ससुरा घासी-राम को बुढापे मे जवानी सुझत रहल है. भैसन के प्रेम सम्बन्ध बनाबे मे मदद करत रहल है. मैने मना किया तो माना नही, अब भुगतो ससूरा, भैस भाग गई ना. कालू-प्रसाद "देशप्रेमी" (बीच मे ही रुपाली को रोकते हुए): इसमे जरूर विपक्षी पार्टी का हाथ रहा होगा. हमारे क्षेत्र मे से भैस को भगवाकर शान्ति भँग करना चाहते हैँ. हम सेकुलर हैँ. ऐसे कम्यूनल पार्टी को हम नही बक्शेँगे. बीच मे ही रुपाली सबको रोकते हुए बोलती है. देशप्रेमी जी हम फिर से वापस होते हैँ लेकिन इस छोटे से ब्रेक के बाद. और दौड्कर रेस्ट रूम चली जाती है.               डा० पद्मनाभ मिश्र   बनाम आदि यायावर पोस्ट आभार : फुल्ली फालतू चैनल / मेरा बकवास / ब्लागपोस्ट 3 नवम्बर, 2007 / आलेख आदि यायावर  सँदर्भित लिंक पोस्ट  : एक चलताऊ चैनल चर्चा / फ़ुरसतिया / ब्लागपोस्ट 3 दिसम्बर 2006 / अनूप शुक्ल पोस्ट : कवर स्टोरी घासीराम की भैंस / बुनो कहानी /  ब्लागपोस्ट 5 दिसम्बर  2006 / जीतेन्द्र चौधरी #कल डा० अनुराग की पोस्ट ने कुछ समय तक अशाँत रखा। मेरे ख़्याल से यह कथ्य कोलाज़ समाज के विस्तृत कैनवास के चित्रण का एक फ़ैशनेबुल रिपीटेशन था, जो एक कोने पर ही टिक कर रह गया है । कुश के स्वर में निहित प्रतिवाद और अनूप शुक्ल की प्रशँसात्मक उलाहना से जैसे मुझे भी बल मिला हो विसँगतियों के विद्रूप का एक अन्य पहलू ’ यह भी खूब रही ’ के प्रयास कुछ अलग तरह से रखते हैं । सिग्नल पर होता मेकअप अप्रैल 16, 2008 दफ्तर आते हुए ट्रैफिक सिग्नल पर एक अजीब सा नजारा देखा… एक ३०-३२ वर्ष की गोरी-चिट्टी मोहतरमा अपनी लंबी सी गाडी में बैठी सिग्नल के हरे होने के इंतज़ार कर रही हैं. इंतजार कुछ लंबा है क्यों ना दर्पण से गुफ्तगु की जाये. बस रियर-व्यु मिरर्र में लगी अपना चेहरा निहारने और गाडी बन गयी ब्यूटी पार्लर. तभी ठक-ठक की आवाज से उनकी एकाग्रता भंग हुई. देखा कोई २५-२८ साल का एक नौजवान, अपने दोनों हाथों और दोनों पैरों की साहयता से एक चौपाये की तरह चल रहा था, भीख माँग रहा था. उन मोहतरमा ने एक नफरत भरी नजर उस पर डाली और फिर लिप्स्टिक निकाल कर अपने होटों की आभा बढाने लगी. मैं उनके लाल-गुलाबी चमकते होठों को निहार रहा था तभी मुझे उस भिखारी का ख्याल आया और मैंने उसके होटों की तरफ देखा. उसके सुखे होटों पर ना खत्म होने वाली एक प्यास थी. फिर उस सुंदरी ने आई-लाईनर लगा कर अपनी सुंदर आँखों को और सुंदर बनाया. मैने भिखारी की उनींदी और अलसाई आँखों की तरफ देखा, उनमें कुछ पाने की लालसा अभी भी दम साधे खडी थी. आँखों के बाद गालों का नम्बर आया. धूप से गुलाबी हुए गालों को और गुलाबी किया जा रहा था. भिखारी के पिचके और भीतर धंसे हुए गाल शायद गुलाबी गालों से इर्ष्या कर रहे थे. इस दौरान कभी-कभी स्वप्न सुंदरी भिखारी की तरफ भी देख लेती थी शायद पूछ रही हो-कैसी लग रही हूँ ? हल्की सी मुस्कुराहट के साथ हाथ अब रंग-बिरंगी बिंदी को एड्जैस्ट करने के लिये माथे पर पहुँच चुके थे. और  वो  भिखारी  उसके  हाथ  भी  माथे  पर थे पसीना पोंछ रहा था या शायद अपनी तकदीर को एड्जैस्ट कर रहा था…पता नहीं. तभी सिग्नल हरा हो गया और गाडी फर्राटे से निकल गयी. पता नहीं कितने सिग्नलों पर कितनी बार वह गाडी रुकेगी और कितनी बार वह अपने रूप को सँवारेगी और कितने ही भिखारीयों को उनके वाकई भिखारी होने का एहसास करवायेगी. उस भीखारी को मैंने बहुत ध्यान से देखा था. उसके  चेहरे  पर एक  सवाल  मुँह  बाये  खडा  था. क्यों भगवान, इतना फर्क क्यों किया ? तूने अमीर को अमीर बनाया मुझे उससे शिकायत नहीं. किंतु कम-से-कम मेरे हाथ-पैर तो सलामत बना देता. तभी ड्राईवर की आवाज से तंद्रा टूटी, “क्यों सर मजा आ गया” ? मैं फीकी सी हँसी हँस दिया. पोस्ट आभार: सिग्नल पर होता मेकअप / ब्लागपृष्ठ : यह भी खूब रही / 16 अप्रैल 2008 / लेखक-प्रयास
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